बिहार को टीबी (यक्ष्मा) मुक्त बनाने के उद्देश्य से पूर्वी चंपारण (मोतिहारी) जिले में एक बड़ी तकनीकी पहल की शुरुआत की गई है। ग्रामीण स्तर पर टीबी के संभावित मरीजों की जल्द और सटीक पहचान करने के लिए जिले के सभी कम्युनिटी हेल्थ ऑफिसर्स (CHO) को डिजिटल ऐप के इस्तेमाल की ट्रेनिंग दी गई है।
जिला स्वास्थ्य समिति के सभागार में आयोजित इस दो दिवसीय विशेष प्रशिक्षण शिविर में सीएचओ को ‘कफ अगेंस्ट टीबी’ (Cough Against TB) ऐप के तकनीकी पहलुओं और संचालन के बारे में विस्तार से जानकारी दी गई।
खांसने की आवाज से होगी टीबी की शुरुआती पहचान
इस कार्यशाला में मुख्य प्रशिक्षक पूर्ण भट्टाचार्य ने स्वास्थ्य कर्मियों को ऐप के कार्यबल, डेटा एंट्री और मरीजों की पहचान करने के वैज्ञानिक तरीकों को समझाया।
- डिजिटल स्क्रीनिंग: यह ऐप संभावित मरीजों की खांसी की आवाज और अन्य लक्षणों के डिजिटल विश्लेषण के आधार पर काम करता है।
- कम समय में रिपोर्ट: जिला यक्षमा पदाधिकारी डॉ. संजीव के अनुसार, यह तकनीक बेहद कम समय में प्राथमिक स्क्रीनिंग रिपोर्ट दे देती है।
- त्वरित इलाज: प्राथमिक रिपोर्ट के आधार पर संदिग्ध मरीजों को आगे की जांच (जैसे बलगम जांच या सीबीनेट टेस्ट) के लिए तुरंत रेफर किया जा सकेगा।
ग्रामीण क्षेत्रों में बढ़ेगा जांच का दायरा, रुकेगा संक्रमण
अक्सर ग्रामीण क्षेत्रों में लोग सामान्य खांसी समझकर टीबी के लक्षणों को नजरअंदाज कर देते हैं, जिससे संक्रमण फैलने का खतरा बढ़ जाता है। अब इस डिजिटल टूल की मदद से स्वास्थ्य व्यवस्था को सीधे गांवों तक पहुंचाया जाएगा।
जिले के दूर-दराज के गांवों में तैनात सीएचओ इस ऐप के जरिए हेल्थ एंड वेलनेस सेंटरों पर आने वाले मरीजों और घर-घर जाकर लोगों की मौके पर ही स्क्रीनिंग कर सकेंगे। सिविल सर्जन डॉ. दिलीप कुमार ने बताया कि इस पहल से ग्रामीण स्तर पर मरीजों की पहचान आसान होगी और सही समय पर इलाज शुरू होने से समाज में टीबी के फैलाव को रोका जा सकेगा।
इस प्रशिक्षण कार्यक्रम के दौरान जिला कार्यक्रम प्रबंधक (DPM) ठाकुर विश्वमोहन, जिला परियोजना समन्वयक (DPC) भारत भूषण, अमरेंद्र कुमार सहित जिले के सभी सामुदायिक स्वास्थ्य पदाधिकारी उपस्थित थे।
संवाददाता अमरजीत सिंह






