बिहार के पूर्वी चंपारण (मोतिहारी) से एक बेहद संवेदनशील मामला सामने आया है। कोटवा कॉलेज परिसर में एक छात्र की दिनदहाड़े चाकू मारकर हत्या किए जाने के एक महीने बाद भी मुख्य आरोपी पुलिस की गिरफ्त से बाहर है। पुलिस की इस धीमी कार्रवाई को लेकर अब स्थानीय लोगों और कानून व्यवस्था पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं।
परीक्षा देकर निकलते ही हुआ था हमला
घटना करीब एक महीने पहले की है, जब पीड़ित छात्र रितेश कोटवा कॉलेज में बीए (BA) की परीक्षा देने आया था। परीक्षा खत्म होने के बाद जैसे ही वह कॉलेज परिसर से बाहर निकला, उसी के गांव के रहने वाले आरोपी सरोज यादव ने उस पर चाकू से ताबड़तोड़ हमला कर दिया।
यह पूरी वारदात वहां मौजूद कई लोगों के सामने हुई। हमले के बाद आरोपी मौके से फरार हो गया। घायल छात्र को तुरंत अस्पताल ले जाया गया, जहां डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया। इस घटना के बाद से ही पूरे इलाके में भारी आक्रोश है।
सोशल मीडिया पर वीडियो वायरल, फिर भी गिरफ्तारी नहीं
इस मामले का सबसे हैरान करने वाला पहलू यह है कि घटना के वक्त वहां मौजूद लोगों ने इसका वीडियो बना लिया था, जो बाद में सोशल मीडिया पर वायरल भी हुआ। वीडियो फुटेज में आरोपी की पहचान पूरी तरह साफ है और पुलिस के पास पुख्ता सबूत भी मौजूद हैं।
इसके बावजूद, एक महीना बीत जाने के बाद भी आरोपी का पकड़े न जाना पुलिस और विशेष जांच टीम (SIT) की कार्यशैली पर सवाल खड़े करता है। स्थानीय लोगों में इस बात को लेकर नाराजगी है कि इतने स्पष्ट सबूत होने के बाद भी जांच एजेंसी आरोपी तक क्यों नहीं पहुंच पाई है।
मीडिया के हस्तक्षेप के बाद इनाम की घोषणा
SIT की सुस्त कार्रवाई को लेकर जब मीडिया ने पुलिस अधीक्षक (SP) से सीधे सवाल किए, तब जाकर पुलिस प्रशासन हरकत में आया। अब मुख्य आरोपी सरोज यादव पर 10 हजार रुपये का इनाम घोषित किया गया है।
आमतौर पर संवेदनशील मामलों में पुलिस तुरंत सख्त कदम उठाती है और कुर्की-जब्ती जैसी कार्रवाई शुरू कर देती है। लेकिन इस मामले में एक महीने तक कोई बड़ी कार्रवाई नहीं होने से स्थानीय प्रशासन की भूमिका पर चर्चाएं तेज हो गई हैं।
स्थानीय जनता में असंतोष और बड़े सवाल
इस घटना ने पुलिस की त्वरित कार्रवाई के दावों पर सवालिया निशान लगा दिया है। स्थानीय नागरिकों का कहना है कि अगर सरेआम हुई हत्या के मामलों में भी आरोपी महीनों तक फरार रहेंगे, तो आम जनता में सुरक्षा की भावना कैसे बनी रहेगी।
अब सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि अगर हर महत्वपूर्ण फैसले और कार्रवाई के लिए पुलिस अधीक्षक (SP) के आदेश का ही इंतजार करना पड़ता है, तो जमीनी स्तर पर काम कर रही SIT और स्थानीय थाने की सक्रियता का क्या औचित्य है?
संवाददाता अमरजीत सिंह







