बिहार 

मोतिहारी: डंकन अस्पताल में बिल न चुकाने पर प्रसूता और नवजात को बनाया बंधक, डीएम के हस्तक्षेप के बाद मिली मुक्ति

On: May 29, 2026 6:54 AM
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स्थान: मोतिहारी/रक्सौल (बिहार) | रिपोर्टर: अमरजीत सिंह | श्रेणी: समाज / स्वास्थ्य

​बिहार के पूर्वी चंपारण (मोतिहारी) जिले के रक्सौल से एक बेहद असंवेदनशील मामला सामने आया है। यहाँ के प्रसिद्ध डंकन अस्पताल पर आरोप लगा है कि उसने इलाज का भारी-भरकम बिल न चुका पाने के कारण एक प्रसूता, उसके चार दिन के नवजात बच्चे और विकलांग परिजनों को चार दिनों तक अस्पताल परिसर में ही रोककर रखा। पीड़ित परिवार की आर्थिक स्थिति अत्यंत दयनीय है, जिसके कारण वे यह राशि चुकाने में असमर्थ थे।

​इस पूरे मामले की जानकारी जब मोतिहारी प्रेस क्लब को मिली, तो उन्होंने तुरंत इसकी सूचना जिला प्रशासन को दी। इसके बाद पूर्वी चंपारण के जिलाधिकारी (डीएम) सौरभ जोरवाल ने मामले को अत्यंत गंभीरता से लिया और उनके कड़े निर्देश के बाद अस्पताल प्रबंधन ने पीड़ित परिवार को बिना किसी अतिरिक्त भुगतान के वहां से जाने की अनुमति दी।

​कबाड़ चुनने और भीख मांगने वाले परिवार पर 75 हजार का बिल

​घटना की पृष्ठभूमि के अनुसार, रामगढ़वा कुष्ठ आश्रम के रहने वाले गणेश पासवान की बेटी ललिता कुमारी को 22 मई को प्रसव पीड़ा हुई थी। परिजन उसे इलाज के लिए रक्सौल के डंकन अस्पताल ले गए, जहाँ ऑपरेशन (सिजेरियन) के जरिए उसने एक बच्ची को जन्म दिया। दाखिले के समय परिवार ने जैसे-तैसे 3,500 रुपये जमा किए थे।

​परिजनों का कहना है कि इलाज पूरा होने के बाद अस्पताल प्रशासन ने उन्हें 75,000 रुपये का अंतिम बिल थमा दिया। पीड़ित परिवार बेहद गरीब है, जो मुख्य रूप से भीख मांगकर और कबाड़ चुनकर अपना जीवन यापन करता है। इतनी बड़ी रकम का इंतजाम करना उनके लिए पूरी तरह से नामुमकिन था।

​चार दिनों तक परिसर में काटनी पड़ी यातना

​आरोप है कि बिल का भुगतान न होने पर अस्पताल प्रबंधन ने संवेदनशीलता की सारी हदें पार करते हुए मां, नवजात शिशु और उनके विकलांग तीमारदारों को बाहर जाने से रोक दिया। यह परिवार चार दिनों तक अस्पताल परिसर में ही लाचार स्थिति में पड़ा रहा। इस दौरान नवजात और जच्चा को आवश्यक देखभाल और सुरक्षित माहौल की कमी का सामना करना पड़ा।

अतिरिक्त संदर्भ: भारत के सर्वोच्च न्यायालय और राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) के स्पष्ट दिशा-निर्देश हैं कि कोई भी अस्पताल बिल बकाया होने के आधार पर किसी भी मरीज या नवजात को बंधक या जबरन रोककर नहीं रख सकता। ऐसा करना गैर-कानूनी और मानवाधिकारों का सीधा उल्लंघन है।

 

​प्रेस क्लब और जिला प्रशासन की मुस्तैदी से मिली राहत

​इस अमानवीय घटना की भनक जब मोतिहारी प्रेस क्लब के पत्रकारों को लगी, तो उन्होंने तत्काल स्थानीय अस्पताल प्रशासन से संपर्क किया और वस्तुस्थिति की जानकारी ली। मामले की गंभीरता को देखते हुए प्रेस क्लब ने तुरंत जिलाधिकारी सौरभ जोरवाल को पूरे घटनाक्रम से अवगत कराया।

​जिलाधिकारी ने मामले को पूरी तरह से गैर-कानूनी और मानवता के खिलाफ मानते हुए डंकन अस्पताल प्रबंधन को सख्त हिदायत जारी की। प्रशासन के दबाव के बाद अस्पताल प्रबंधन को झुकना पड़ा और उन्होंने परिवार से कोई भी अतिरिक्त पैसा लिए बिना, उन्हें सम्मानपूर्वक वहां से विदा किया। चार दिनों की इस मानसिक और शारीरिक प्रताड़ना के बाद जब परिवार मुक्त हुआ, तो उनकी आँखों में राहत के आंसू थे।

​स्वास्थ्य सेवाओं की संवेदनशीलता पर गंभीर सवाल

​इस घटना ने एक बार फिर निजी और अर्ध-सरकारी स्वास्थ्य संस्थानों की कार्यप्रणाली और उनकी संवेदनशीलता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। स्थानीय नागरिकों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि क्या किसी गरीब की आर्थिक तंगी उसके बुनियादी जीने के अधिकार और स्वास्थ्य सुविधाओं से बड़ी हो सकती है? इस प्रकार की घटनाओं को रोकने के लिए स्वास्थ्य विभाग को ऐसे संस्थानों पर कड़ी निगरानी रखनी चाहिए ताकि भविष्य में किसी अन्य असहाय परिवार को इस तरह की यातना न झेलनी पड़े।

संवाददाता अमरजीत सिंह 

Sachcha Samachar Desk

Sachcha Samachar Desk वेबसाइट की आधिकारिक संपादकीय टीम है, जो देश और दुनिया से जुड़ी ताज़ा, तथ्य-आधारित और निष्पक्ष खबरें तैयार करती है। यह टीम विश्वसनीयता, ज़िम्मेदार पत्रकारिता और पाठकों को समय पर सही जानकारी देने के सिद्धांत पर काम करती है।

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