टोक्यो की स्काईलाइन पर शुक्रवार रात एक अनोखा नज़ारा देखने को मिला। जापान की शान मानी जाने वाली टोक्यो स्काई ट्री तिरंगे की रोशनी में नहा उठी। saffron, white और green के रंगों में जगमगाता यह दृश्य न सिर्फ भारतीयों के लिए गौरव का क्षण था, बल्कि यह भी संकेत था कि भारत और जापान के रिश्तों की गहराई अब नए पड़ाव पर है। यह मौका था भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लगभग सात साल बाद पहले द्विपक्षीय जापान दौरे का।
यह दौरा प्रधानमंत्री मोदी की दो देशों की यात्रा का पहला पड़ाव है। इसके बाद वह चीन के तियानजिन शहर पहुंचेंगे, जहां वह शंघाई सहयोग संगठन (SCO) शिखर सम्मेलन में शामिल होंगे। लेकिन टोक्यो का यह पड़ाव कई मायनों में ऐतिहासिक और खास है।
भारतीय रंगों में रचा-बसा टोक्यो
प्रधानमंत्री मोदी के स्वागत के लिए जापान में बसे भारतीय समुदाय ने रंग-बिरंगी तैयारियां कीं। होटल लॉबी में गायत्री मंत्र की गूंज सुनाई दी तो कहीं भारतीय लोकगीतों ने वातावरण को जीवंत कर दिया। भारतीय प्रवासी तिरंगे के स्कार्फ और झंडों के साथ प्रधानमंत्री का स्वागत करने पहुंचे। भले ही जापान में भारतीय समुदाय का आकार छोटा है, लेकिन उनकी जड़ें गहरी हैं और इस स्वागत ने भारत-जापान रिश्तों की भावनात्मक मजबूती को दर्शाया।
कूटनीति का बदलता समीकरण
प्रधानमंत्री मोदी ऐसे समय में जापान पहुंचे हैं जब भारत और अमेरिका के बीच रिश्तों में खटास आई है। डोनाल्ड ट्रंप की सरकार द्वारा 50% आयात शुल्क लगाए जाने के बाद भारत और वॉशिंगटन के बीच आर्थिक तनाव पैदा हुआ है। ऐसे में टोक्यो ने इस मौके को अवसर में बदलने की कोशिश की।
गौर करने वाली बात यह रही कि मोदी के टोक्यो पहुंचने से ठीक पहले जापान के शीर्ष व्यापार वार्ताकार ने अमेरिका की यात्रा अचानक रद्द कर दी। यह संयोग हो सकता है, लेकिन कूटनीति में हर संकेत मायने रखता है।
आर्थिक सहयोग के नए रास्ते
टोक्यो में प्रधानमंत्री मोदी ने सबसे पहले इंडिया-जापान इकोनॉमिक फोरम को संबोधित किया। उन्होंने यहां भारत की अपग्रेडेड क्रेडिट रेटिंग का जिक्र करते हुए कहा कि अब दुनिया न केवल भारत को देख रही है बल्कि उस पर भरोसा भी कर रही है। मोदी ने जापानी कारोबारियों से भारत में निवेश करने और “Make in India, Make for the World” की अपील की।
इसके बाद मोदी ने जापान के प्रधानमंत्री शिगेरु इशिबा से मुलाकात की। दोनों नेताओं ने लोकतंत्र, वैश्विक स्थिरता और इंडो-पैसिफिक ऑर्डर जैसे अहम मुद्दों पर चर्चा की। प्रधानमंत्री मोदी ने कहा:
“भारत और जापान मिलकर एशियाई सदी को आकार देंगे। हमारी साझेदारी आपसी विश्वास पर आधारित है, यह हमारे राष्ट्रीय प्राथमिकताओं को दर्शाती है और साझा मूल्यों व विश्वासों से प्रेरित है।”
जापान ने भारत में अगले दशक में 10 ट्रिलियन येन (करीब 68 अरब डॉलर) निवेश का ऐलान किया है। यह निवेश इंफ्रास्ट्रक्चर, ग्रीन एनर्जी, डिजिटल साझेदारी और भारतीय स्टार्टअप्स में किया जाएगा।
हाई-टेक साझेदारी का रोडमैप
मोदी और इशिबा की बैठक से कई हाई-टेक समझौते सामने आए।
- डिजिटल पार्टनरशिप: आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर पर संयुक्त प्रयास।
- चंद्रयान-5 मिशन सहयोग: ISRO और जापान स्पेस एजेंसी मिलकर लूनर पोलर मिशन पर काम करेंगे।
- सेमीकंडक्टर और रेयर अर्थ मिनरल्स साझेदारी: आज की दुनिया में चिप्स ही शक्ति हैं और सप्लाई चेन संप्रभुता का प्रतीक। जापान के पास तकनीक है लेकिन पैमाना नहीं, वहीं भारत के पास बाजार और क्षमता है। दोनों के लिए यह साझेदारी स्वाभाविक कदम है।
लोगों को जोड़ने की पहल
आर्थिक और तकनीकी सहयोग से परे सबसे बड़ा लक्ष्य इंसानों के बीच जुड़ाव को बढ़ाना है। भारत और जापान ने पांच लाख लोगों के आदान-प्रदान का रोडमैप तय किया है।
- इसमें 50,000 भारतीय कामगार जापान की वृद्ध होती अर्थव्यवस्था में योगदान देंगे।
- भारतीय छात्रों के लिए जापान में पढ़ाई के नए अवसर खुलेंगे।
- सांस्कृतिक साझेदारी के जरिए दोनों देशों के बीच आपसी समझ को गहरा किया जाएगा।
क्यों खास है यह दौरा?
भारत-जापान संबंध हमेशा से स्थिर और भरोसेमंद रहे हैं। लेकिन मौजूदा दौर में यह साझेदारी और भी अहम हो गई है।
- अमेरिका की अविश्वसनीय नीतियों के बीच भारत के लिए जापान एक भरोसेमंद एंकर के रूप में सामने आया है।
- दोनों देशों ने 10 साल का संयुक्त विजन डॉक्यूमेंट जारी किया है, जो आने वाले दशक के रिश्तों की दिशा तय करेगा।
- यह दौरा भारत की मल्टी-अलाइनमेंट पॉलिसी को मजबूती देता है, जिसमें भारत एक साथ अमेरिका, जापान, रूस और चीन जैसे देशों से संबंधों को संतुलित करने की कोशिश कर रहा है।
चीन का पड़ाव और SCO शिखर सम्मेलन
टोक्यो के बाद प्रधानमंत्री मोदी का अगला पड़ाव है चीन का तियानजिन शहर, जहां वह SCO शिखर सम्मेलन में हिस्सा लेंगे। यह भी उनकी सात साल में चीन की पहली यात्रा होगी।
यह सम्मेलन ऐसे समय हो रहा है जब ट्रंप की ट्रेड वॉर ने वैश्विक बाजारों को हिला दिया है। ऐसे में भारत के सामने बड़ी चुनौती है कि वह चीन और रूस के साथ अपने रिश्तों को मजबूत करते हुए वैश्विक व्यापार व्यवस्था में संतुलन कैसे कायम रखे।
भारत की “मल्टी-अलाइनमेंट पॉलिसी” का असली इम्तिहान इसी सम्मेलन में होगा। सवाल यह है कि क्या चीन के साथ बातचीत से एक नई साझेदारी की नींव रखी जा सकती है? और क्या रूस के साथ करीबी संवाद भारत की स्थिति को वैश्विक स्तर पर और मजबूत करेगा?
निष्कर्ष
प्रधानमंत्री मोदी का यह दौरा सिर्फ द्विपक्षीय समझौतों तक सीमित नहीं है। यह भारत की बदलती भूराजनीतिक भूमिका को दर्शाता है। टोक्यो ने इस यात्रा को रंगीन और उत्साहपूर्ण बनाया, वहीं तियानजिन में होने वाला SCO सम्मेलन इस दौरे का असली इम्तिहान होगा।
भारत अब सिर्फ दर्शक नहीं बल्कि वैश्विक राजनीति का सक्रिय खिलाड़ी बन रहा है। अमेरिका की अनिश्चित नीतियों के बीच भारत ने जापान और चीन दोनों के साथ संवाद को प्राथमिकता देकर यह संदेश दिया है कि आने वाली एशियाई सदी में भारत की भूमिका केंद्रीय होगी।
✍️ लेखक की राय:
यह दौरा भारत की विदेश नीति में एक नए युग की शुरुआत का संकेत है। जापान में निवेश और तकनीकी साझेदारी भारत के विकास मॉडल को नई गति दे सकते हैं, वहीं चीन और रूस के साथ संवाद भारत को वैश्विक स्तर पर एक मजबूत, स्वतंत्र और संतुलित शक्ति के रूप में पेश करेगा।












