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फ्रांस में क्यों बदला प्रधानमंत्री? ‘ब्लॉक एवरीथिंग’ आंदोलन से हिली सरकार – पूरी कहानी

On: September 26, 2025 5:29 PM
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फ्रांस में क्यों बदला प्रधानमंत्री? ‘ब्लॉक एवरीथिंग’ आंदोलन से हिली सरकार – पूरी कहानी
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फ्रांस, जिसे दुनिया की सबसे पुरानी और स्थिर लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं में से एक माना जाता है, आजकल गहरे राजनीतिक उथल-पुथल के दौर से गुज़र रहा है। महज़ दो साल के भीतर पाँच प्रधानमंत्रियों का बदलना किसी भी विकसित देश के लिए एक असामान्य और चिंताजनक स्थिति है। इस अस्थिरता की कड़ी में हालिया शिकार बने हैं प्रधानमंत्री फ्रांस्वा बायरू, जिन्हें अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा। इसकी मुख्य वजह रही — सोशल मीडिया से उपजा ‘ब्लॉक एवरीथिंग’ नाम का राष्ट्रव्यापी आंदोलन और सरकार की सख़्त आर्थिक नीतियाँ।

​लेकिन यहाँ असली सवाल यह है: आखिर ऐसा क्या हुआ कि हज़ारों-लाखों लोग सड़कों पर उतर आए और देश के प्रधानमंत्री को अपनी कुर्सी छोड़नी पड़ी? आइए, इस पूरी घटना के घटनाक्रम को सिलसिलेवार तरीक़े से समझते हैं।

​नेपाल से फ्रांस तक: विरोध की ‘ब्लॉक एवरीथिंग’ लहर

​बीते कुछ महीनों में एक चौंकाने वाला ट्रेंड एशिया से लेकर यूरोप तक देखने को मिला है। श्रीलंका, पाकिस्तान, बांग्लादेश और नेपाल जैसे विकासशील देशों में जनता ने सड़कों पर उतरकर सत्ता परिवर्तन करवा दिया। अब यही सिलसिला यूरोपीय महाद्वीप तक भी पहुँच चुका है।

​नेपाल में हाल ही में सरकार गिरी थी, और अब फ्रांस में भी वैसी ही स्थिति बनी। 9 सितंबर की रात को प्रधानमंत्री बायरू को इस्तीफा देना पड़ा, क्योंकि अगले दिन यानी 10 सितंबर को देशव्यापी विरोध-प्रदर्शनों की तैयारी थी।

फ्रांस में ‘ब्लॉक एवरीथिंग’ आंदोलन क्या है?

​फ्रांस में यह पूरा आंदोलन सोशल मीडिया के ज़रिए शुरू हुआ। 10 सितंबर को पूरे देश से विरोध की अपील की गई, जिसे नाम दिया गया ‘ब्लॉक एवरीथिंग’ (सब कुछ बंद करो)।

  • ​इस अपील का सीधा मक़सद था – लाखों लोगों का सड़कों पर उतरना और सरकार के कठोर वित्तीय फैसलों के ख़िलाफ़ प्रदर्शन करना।
  • लाखों लोग सड़कों पर निकल आए। जगह-जगह जाम लगा, और प्रदर्शन के दौरान सरकारी संपत्ति को भारी नुकसान पहुँचाया गया।
  • ​हालात को काबू करने के लिए सरकार को 80,000 से अधिक पुलिसकर्मियों को तैनात करना पड़ा, और 300 से ज़्यादा लोगों को गिरफ्तार किया गया।
  • ​जनता के इस भारी दबाव के सामने प्रधानमंत्री बायरू के पास इस्तीफा देने के अलावा और कोई विकल्प नहीं बचा।

​जनता का गुस्सा किस बात पर फूटा?

​फ्रांस में इस व्यापक प्रदर्शन की जड़ में थी सरकार द्वारा की गई बजट कटौती और कल्याणकारी योजनाओं में बड़े बदलाव

​प्रधानमंत्री बायरू ने संसद में बजट पेश करते हुए कई सख़्त आर्थिक फैसले घोषित किए, जिनमें जनता को नागवार गुज़रे:

  • ​राष्ट्रीय बजट से 43.8 मिलियन फ्रैंक की भारी कटौती
  • दो राष्ट्रीय छुट्टियों को पूरी तरह से ख़त्म करना।
  • ​सरकारी पेंशन योजनाओं पर रोक लगाना।
  • हेल्थकेयर बजट में 5 बिलियन फ्रैंक की कटौती।

​फ्रांस जैसे विकसित देश में, जहाँ नागरिक मुफ्त हेल्थकेयर, सुनिश्चित पेंशन और मिनिमम वेज जैसी सामाजिक सुरक्षा के अभ्यस्त हैं, इन सुविधाओं पर कैंची चलते ही उनका गुस्सा फूट पड़ा और वे सड़कों पर उतर आए।

संसद में भी प्रधानमंत्री की हार

​प्रधानमंत्री बायरू ने संसद में बजट कटौती का प्रस्ताव रखते हुए चेतावनी दी थी कि अगर अभी सख़्त कदम नहीं उठाए गए, तो फ्रांस की अर्थव्यवस्था गहरे संकट में चली जाएगी। लेकिन उनकी अपील को नज़रअंदाज़ कर दिया गया।

  • ​प्रस्ताव के समर्थन में केवल 194 वोट पड़े।
  • ​इसके विपक्ष में 364 वोट डाले गए।

​यह स्पष्ट संकेत था कि सिर्फ जनता ही नहीं, बल्कि संसद में भी प्रधानमंत्री के लिए समर्थन लगभग खत्म हो चुका था।

​फ्रांस की असल आर्थिक चुनौतियाँ

​फ्रांस की मौजूदा स्थिति को समझने के लिए उसके आर्थिक आँकड़ों पर ग़ौर करना आवश्यक है। देश के वित्तीय हालात चिंताजनक हैं:

  • डेब्ट-टू-जीडीपी रेश्यो (Debt-to-GDP Ratio) 114% पर पहुँच चुका है। इसका मतलब है कि देश हर 100 यूरो कमाने पर 114 यूरो का कर्जदार है।
  • ​देश पर कुल कर्ज लगभग 3345 बिलियन यूरो है।
  • ​प्रत्येक फ्रांसीसी नागरिक पर लगभग 500 यूरो का अतिरिक्त बोझ है।
  • बजट डेफिसिट (राजकोषीय घाटा) 5.8% पर बना हुआ है।

​एक तरह से, यूरोप के धनी देशों में गिना जाने वाला फ्रांस अब ग्रीस और इटली जैसे देशों की तरह गंभीर कर्ज संकट के दलदल में फँस चुका है।

संकट इतना बड़ा क्यों हो गया?

​1974 तक फ्रांस आर्थिक रूप से इतना मज़बूत था कि उसका बजट हमेशा सरप्लस में रहता था। लेकिन समय के साथ, सरकार की उदार सामाजिक सुरक्षा योजनाओं का ख़र्च बेकाबू होता गया।

  • आबादी का बूढ़ा होना और पेंशन का बढ़ता बोझ
  • कामकाजी वर्ग का घटना और उत्पादन में कमी
  • ​2022 से पहले तक ब्याज दरें कम थीं, इसलिए कर्ज की समस्या नज़रअंदाज़ होती रही।
  • ​लेकिन 2022 के बाद ब्याज दरें तेज़ी से बढ़ीं और कर्ज महँगा हो गया।

​यही वजह रही कि फ्रांस अचानक गंभीर आर्थिक दबाव में आ गया और सरकार को मजबूरन बड़े खर्चों में कटौती करनी पड़ी।

जनता की नज़र में सरकार की सबसे बड़ी ग़लती

​फ्रांस की जनता का मानना ​​है कि सरकार की नीतियाँ अमीरों को फ़ायदा पहुँचा रही हैं, जबकि गरीबों और मध्यम वर्ग के हक़ पर कैंची चला रही हैं। कल्याणकारी योजनाओं, छुट्टियों, पेंशन और हेल्थ फंड में कटौती जैसे कदम इसी गुस्से का कारण बने।

​नए प्रधानमंत्री की नियुक्ति

​बायरू के इस्तीफे के बाद, राष्ट्रपति इमैनुअल मैक्रोन ने सेबेस्टियन लकार्नू को देश का नया प्रधानमंत्री नियुक्त किया है।

  • ​लकार्नू इससे पहले डिफेंस मिनिस्टर के रूप में काम कर चुके हैं।
  • ​महज़ 39 साल की उम्र में उन्हें यह बहुत बड़ी ज़िम्मेदारी सौंपी गई है।
  • ​उन्होंने हाल ही में रक्षा बजट को बढ़ाकर सुर्खियाँ बटोरी थीं।

​अब सबकी नज़र इस बात पर है कि लकार्नू देश की राजनीतिक अस्थिरता और जटिल आर्थिक संकट दोनों को एक साथ कैसे संभालते हैं।

​दुनिया के लिए एक बड़ा सबक

​फ्रांस की यह स्थिति एक स्पष्ट संकेत है कि दुनिया की सबसे विकसित अर्थव्यवस्थाएँ भी अचानक और तेज़ी से संकट में फँस सकती हैं।

​सबसे महत्वपूर्ण यह है कि सोशल मीडिया पर पनपे आंदोलनों में अब सरकारों को हिलाने की ताक़त आ गई है। नेपाल, बांग्लादेश और अब फ्रांस — इन तीनों जगहों पर जनता ने कुछ ही दिनों के भीतर एकजुट होकर सत्ता परिवर्तन करवा दिया। सवाल यही है कि क्या यह घटनाक्रम नई वैश्विक राजनीतिक प्रवृत्ति की शुरुआत है?

नतीजा

​फ्रांस का संकट महज़ उसका आंतरिक मुद्दा नहीं, बल्कि पूरी दुनिया के लिए एक ठोस चेतावनी है कि बेलगाम बढ़ते कर्ज और घटते संसाधन किसी भी मज़बूत सरकार को अस्थिर कर सकते हैं। ‘ब्लॉक एवरीथिंग’ आंदोलन ने यह साबित कर दिया कि जब जनता एकजुट हो जाए, तो सोशल मीडिया की ताक़त से पैदा हुए दबाव के आगे बड़ी-बड़ी सरकारें भी टिक नहीं पातीं।

​अब सारी नज़रें युवा प्रधानमंत्री सेबेस्टियन लकार्नू पर टिकी हैं – क्या वे फ्रांस को इस दोहरे राजनीतिक और आर्थिक संकट से सफलतापूर्वक बाहर निकाल पाएँगे, या देश जल्द ही एक और सत्ता परिवर्तन का गवाह बनेगा?

Sachcha Samachar Desk

Sachcha Samachar Desk वेबसाइट की आधिकारिक संपादकीय टीम है, जो देश और दुनिया से जुड़ी ताज़ा, तथ्य-आधारित और निष्पक्ष खबरें तैयार करती है। यह टीम विश्वसनीयता, ज़िम्मेदार पत्रकारिता और पाठकों को समय पर सही जानकारी देने के सिद्धांत पर काम करती है।

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