हाल ही के दिनों में एक साधारण-सी दिखने वाली तस्वीर ने अंतरराष्ट्रीय राजनीति के गलियारों में हलचल मचा दी है। इस एक फ्रेम में भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन, और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग एक साथ खड़े थे। यह मात्र एक क्लिक नहीं था; यह संदेश था कि भारत की कूटनीति किसी एक धुरी तक सिमटी हुई नहीं है। इस दृश्य के सामने आते ही, अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का भारत को देखने का नज़रिया एकदम से पलट गया।
विडंबना देखिए—जो ट्रंप कुछ ही समय पहले तक भारतीय निर्यात पर भारी टैरिफ लगाने और भारत के साथ व्यापारिक सख्ती बरतने की बातें कर रहे थे, अब सार्वजनिक मंच पर प्रधानमंत्री मोदी को ‘महान नेता’ और ‘करीबी दोस्त’ बता रहे हैं। सवाल यह उठता है कि आखिर वह कौन-सी निर्णायक बात रही जिसने ट्रंप के रुख को इतनी तेज़ी से बदल दिया? आइए, इस व्यापक बदलाव के पीछे के राजनीतिक और आर्थिक समीकरणों को गहराई से समझते हैं।
भारत-अमेरिका संबंध: उतार-चढ़ाव और रणनीतिक दांव-पेंच
भारत और अमेरिका की साझेदारी हमेशा से ही जटिल और बहुआयामी रही है। एक ओर आर्थिक सहयोग, रक्षा सौदे और रणनीतिक संवाद इस रिश्ते की नींव रहे हैं, वहीं दूसरी ओर, समय-समय पर व्यापार और नीतियों को लेकर तीखे मतभेद भी उभरते रहे हैं।
डोनाल्ड ट्रंप के शासनकाल में, व्यापार के मसले पर भारत को कई सख्त फैसलों का सामना करना पड़ा। उनका प्रशासन ‘अमेरिका फर्स्ट’ की नीति पर दृढ़ था, जिसका सीधा असर भारतीय निर्यातकों पर पड़ा:
- टैरिफ का वार: ट्रंप प्रशासन ने कई भारतीय उत्पादों पर 50% तक टैरिफ लगाने की धमकी दी, जिससे भारतीय कारोबार जगत में खासा चिंता फैल गई थी।
- GSP की समाप्ति: 2019 में, अमेरिका ने भारत से जनरलाइज्ड सिस्टम ऑफ प्रेफरेंसेज (GSP) की सुविधा छीन ली। इस सुविधा के तहत भारतीय सामान को अमेरिकी बाज़ार में कम या बिना शुल्क के प्रवेश मिल जाता था।
इस व्यापारिक दबाव के बावजूद, भारत ने अपनी रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखी। मोदी सरकार ने जहां एक ओर अमेरिका के साथ संवाद जारी रखा, वहीं दूसरी ओर रूस और अन्य वैश्विक शक्तियों के साथ अपने व्यापारिक और रक्षा संबंधों को मज़बूत करने की दिशा में भी कदम बढ़ाए।
तस्वीर का निर्णायक प्रभाव: बहुध्रुवीय दुनिया का संकेत
वैश्विक कूटनीति में, कुछ तस्वीरें इतनी प्रभावी होती हैं कि वे एक पूरा अध्याय बयां कर देती हैं। जब मोदी, पुतिन और शी जिनपिंग एक ही फ्रेम में दुनिया को दिखाई दिए, तो यह अमेरिका और पश्चिमी देशों के लिए एक स्पष्ट संदेश था: भारत किसी एक गुट पर निर्भर रहने वाला देश नहीं है।
यह दृश्य अमेरिका के रणनीतिक योजनाकारों के लिए चिंता का विषय बन गया। अमेरिका लंबे समय से भारत को इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में चीन की बढ़ती आर्थिक और सैन्य ताकत को संतुलित करने वाले एक प्रमुख सहयोगी के रूप में देखता आया है। अब, भारत का रूस और चीन के साथ सक्रिय संवाद बनाए रखना, अमेरिका के इस डर को पुख्ता करता है कि कहीं भारत उससे रणनीतिक रूप से दूर न हो जाए।
ट्रंप के सुर बदले: “मोदी हमारे बहुत अच्छे दोस्त हैं”
उस तस्वीर के वैश्विक मंच पर आने के तुरंत बाद, डोनाल्ड ट्रंप का लहजा नाटकीय ढंग से बदल गया। अपनी पुरानी नीतियों की आलोचना को दरकिनार करते हुए, उन्होंने मीडिया में प्रधानमंत्री मोदी की जमकर तारीफ़ की।
उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा:
”मोदी हमारे बहुत अच्छे दोस्त हैं।”
“वह एक महान नेता हैं और भारत जैसे विशाल देश के लिए यह ज़रूरी है।”
“हमें भारत से दूर नहीं होना चाहिए।”
ट्रंप ने अपने बदले हुए रुख को सही ठहराते हुए स्वीकार किया कि भारत के रूस से बड़ी मात्रा में तेल खरीदने के कारण उन्होंने टैरिफ बढ़ाए थे, लेकिन अब उन्हें यह अहसास हो रहा है कि इस सख्ती ने कहीं न कहीं अमेरिका को नुक़सान पहुँचाया और भारत को रूस और चीन के और क़रीब धकेल दिया। यह एक तरह से अपनी पूर्व व्यापार नीति की अप्रत्यक्ष स्वीकारोक्ति थी।
भारत का रणनीतिक और आर्थिक महत्व: विशाल बाज़ार की शक्ति 💪
अमेरिका और पश्चिमी देशों के लिए भारत को नज़रअंदाज़ न कर पाने का सबसे बड़ा कारण उसका विशाल बाज़ार और तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्था है।
- जनसांख्यिकीय लाभांश: भारत की आबादी और युवा उपभोक्ता वर्ग इसे दुनिया का सबसे आकर्षक बाज़ार बनाते हैं।
- निवेश का केंद्र: तकनीक, ऊर्जा, ऑटोमोबाइल, और डिजिटल सेवाओं जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में भारत विदेशी निवेशकों के लिए एक पसंदीदा गंतव्य बन चुका है।
कोई भी महाशक्ति इतने बड़े बाज़ार और रणनीतिक साझेदार को लंबी अवधि तक नाराज़ करने का जोखिम नहीं उठा सकती। ट्रंप सहित कई अमेरिकी नेताओं को अब यह बात स्पष्ट रूप से समझ आ गई है कि भारत से रिश्ते बिगाड़ना आर्थिक और रणनीतिक दोनों ही मायनों में महंगा सौदा साबित होगा।
निष्कर्ष: भारत, वैश्विक शक्ति संतुलन का केंद्र
डोनाल्ड ट्रंप का यह ‘यू-टर्न’ इस बात का ठोस प्रमाण है कि भारत अब वैश्विक राजनीति का एक अनिवार्य केंद्र बन चुका है। भारत की विदेश नीति, जो कि ‘रणनीतिक स्वायत्तता’ के सिद्धांत पर टिकी है, सफलतापूर्वक यह संदेश देने में कामयाब रही है कि वह किसी भी गुट की जागीर नहीं है।
मोदी, पुतिन, और शी जिनपिंग की वह एक तस्वीर—चाहे वह संयोगवश खींची गई हो या एक सोची-समझी कूटनीतिक चाल—ने यह स्पष्ट कर दिया है कि भारत की अहमियत को नज़रअंदाज़ करना अब किसी भी वैश्विक शक्ति के लिए संभव नहीं है। आने वाले समय में, अमेरिका और भारत के संबंध किस दिशा में विकसित होते हैं, यह देखना दिलचस्प होगा, लेकिन इतना तय है कि भारत की कूटनीतिक पकड़ मज़बूत हुई है।












