बिहार की राजनीति एक बार फिर उबाल पर है। आगामी चुनावी समर से पहले नेताओं के बयानबाज़ी का दौर तेज़ हो चला है, और इस बार सीधा हमला बोला है राजनीतिक रणनीतिकार से नेता बने प्रशांत किशोर (पीके) ने। उन्होंने न सिर्फ़ मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को कटघरे में खड़ा किया, बल्कि कांग्रेस के शीर्ष नेता राहुल गांधी की चुप्पी पर भी बड़ा सवाल उठाया है। पीके का दो टूक आरोप है कि आज बिहार का आम आदमी मौजूदा सरकार से नाराज़गी की चरम सीमा पर है, क्योंकि राज्य भ्रष्टाचार, बेरोज़गारी और ज़बरदस्त पलायन की समस्याओं से बुरी तरह त्रस्त है।
प्रशांत किशोर ने बिना लाग-लपेट के कहा कि नीतीश कुमार जनता की तकलीफ़ों से पूरी तरह से अनजान बने हुए हैं, मानो उन्होंने आँखों पर पट्टी बाँध ली हो। उनके मुताबिक, मुख्यमंत्री के इर्द-गिर्द घूमने वाले “चार-पाँच चाटुकार मंत्री और कुछ भ्रष्ट नेता” खुलेआम जनता से पैसा उगाही में लगे हुए हैं। इसके साथ ही, पीके ने राहुल गांधी से यह भी पूछा कि बिहार की इन बुनियादी समस्याओं पर वे चुप्पी क्यों साधे हुए हैं, जबकि वे राष्ट्रीय मुद्दों पर लगातार बोलते रहे हैं।
नीतीश पर कटाक्ष: “कान में तेल डालकर सो रहे हैं”
प्रशांत किशोर ने सबसे पहले मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पर तीखे हमले किए। उनका स्पष्ट कहना था कि बिहार में विकराल रूप ले चुकी समस्याओं का समाधान खोजने के बजाय, सरकार ने मौन धारण कर लिया है।
- उनका यह जुमला कि नीतीश कुमार “कान में तेल डालकर सो रहे हैं”, सीधे तौर पर मुख्यमंत्री की उदासीनता को दर्शाता है।
- पीके का आरोप है कि भ्रष्टाचार की हालत ये है कि कुछ मंत्री और उनके चेले जनता को खुलेआम लूट रहे हैं।
- वे मानते हैं कि राज्य का हर तबका—किसान, युवा, गरीब—बेहाल है, मगर सरकार को रत्ती भर परवाह नहीं है।
पीके ने स्पष्ट संदेश देने की कोशिश की है कि बिहार की गाड़ी पटरी से उतर चुकी है और मुख्यमंत्री ने खुद को जनता के दुखों से पूरी तरह अलग-थलग कर लिया है।
राहुल गांधी की चुप्पी पर सवालिया निशान
अपने बयान के दूसरे चरण में, प्रशांत किशोर ने कांग्रेस नेता राहुल गांधी को निशाने पर लिया। उन्होंने सीधा पूछा कि जब बिहार बेरोज़गारी और पलायन की आग में जल रहा है, तो राहुल गांधी ने आज तक इस मुद्दे पर एक शब्द भी क्यों नहीं कहा?
पीके का तर्क है कि राहुल गांधी राष्ट्रीय राजनीति पर तो हर रोज़ बयान देते हैं, लेकिन बिहार जैसे राज्य की मूलभूत समस्याओं पर उनकी यह अटूट चुप्पी किसी के गले नहीं उतर रही। यह बयान कांग्रेस जैसी मुख्य विपक्षी पार्टी की बिहार में निष्क्रियता को उजागर करता है, और यह दर्शाता है कि पलायन और बेरोज़गारी जैसे सबसे बड़े मानवीय संकट पर राजनीतिक खामोशी अब जनता के बीच चर्चा का विषय बन चुकी है।
भ्रष्टाचार और पलायन: बिहार का सबसे बड़ा दर्द
पीके ने बिहार की दो सबसे बड़ी नासूर बन चुकी समस्याओं—भ्रष्टाचार और पलायन—को अपने बयान का केंद्र बनाया। उन्होंने दोहराया कि “चार-पाँच मंत्री और चार-पाँच भ्रष्ट नेता” जिस तरह से जनता से पैसा उगाही कर रहे हैं, उससे लोगों का सरकार पर से विश्वास टूटता जा रहा है।
पलायन के मुद्दे पर उनका कहना था कि यह समस्या दशकों पुरानी है, मगर आज भी लाखों युवा रोज़गार की तलाश में दूसरे राज्यों की ओर धक्के खा रहे हैं। उनका मानना है कि अगर नेताओं ने इन मुद्दों पर मुँह नहीं खोला, तो उन्हें जल्द ही जनता के गुस्से का सामना करना पड़ेगा।
प्रशांत किशोर का यह बयान सिर्फ़ एक राजनीतिक हमला नहीं है, बल्कि यह बिहार की तस्वीर का कड़वा सच है। उन्होंने भ्रष्टाचार, बेरोज़गारी और पलायन जैसे जन-सरोकार के मुद्दों को एक बार फिर राजनीति के केंद्र में ला दिया है। अब देखना यह है कि सत्ता और विपक्ष के नेता इस हमले का जवाब किस तरह से देते हैं।










