बिहार विधानसभा चुनाव 2025 की ढोल बजनी शुरू हो चुकी है। इस बार सबसे ज्यादा चर्चा का विषय हैं राहुल गांधी और तेजस्वी यादव की जोड़ी। कागज़ पर देखें तो कांग्रेस (Congress) और आरजेडी (RJD) का यह ‘महागठबंधन’ मजबूत दिख रहा है, लेकिन अंदरखाने की बात यह है कि राहुल गांधी का बिहार में इतना सक्रिय होना तेजस्वी यादव के लिए फायदे का सौदा कम और चुनौती ज़्यादा साबित हो सकता है।
राहुल गांधी क्यों आए बिहार? सियासी खिचड़ी में नया उबाल
राहुल गांधी आजकल बिहार में खूब पसीना बहा रहे हैं। लगातार सभाएं, रोड शो और यात्राएं हो रही हैं। तेजस्वी यादव भी हर जगह उनके साथ दिख रहे हैं। महागठबंधन इसे भले ही अपनी ताकत बता रहा हो, लेकिन दिल्ली और पटना दोनों जगह के जानकार मानते हैं कि इस नजदीकी ने कांग्रेस और आरजेडी के रिश्तों में कुछ नई उलझनें पैदा कर दी हैं।
1. रेवंत रेड्डी: बिहारियों के दिल में कांटे क्यों?
राहुल गांधी के मंच पर रेवंत रेड्डी का होना, सीधे-सीधे बिहारियों की भावनाओं पर चोट है। यह वही नेता हैं जिन्होंने पहले बिहारियों के DNA और प्रवासी मजदूरों को लेकर बेतुके बयान दिए थे। अब वही शख्स जब राहुल गांधी के बगल में खड़ा दिखता है, तो विपक्ष को बैठे-बिठाए मौका मिल जाता है।
विपक्षी पार्टियाँ शोर मचा रही हैं कि कांग्रेस और आरजेडी ने बिहारियों का अपमान किया है। इस भावनात्मक मुद्दे का सीधा डैमेज तेजस्वी यादव की साख पर पड़ेगा, जिसे वो युवाओं के दम पर बड़ी मुश्किल से खड़ा कर रहे हैं।
2. मुख्यमंत्री चेहरे पर चुप्पी: ‘दूध का जला, छाछ भी फूंक-फूंक कर पीता है’
तेजस्वी यादव बार-बार राहुल गांधी को पीएम पद का दावेदार बता रहे हैं। लेकिन क्या कांग्रेस ने उन्हें बिहार के मुख्यमंत्री चेहरा (CM Face) के तौर पर घोषित किया है? जवाब है, नहीं।
कांग्रेस की यह चुप्पी आरजेडी के कार्यकर्ताओं और वोटरों में भ्रम पैदा कर रही है। लोगों के मन में सवाल है कि क्या कांग्रेस सच में तेजस्वी को सपोर्ट करेगी या आखिरी वक्त पर ‘खेल’ हो जाएगा? अगर राहुल गांधी खुलकर तेजस्वी का नाम नहीं लेते, तो महागठबंधन की एकजुटता पर सवालिया निशान लगना तय है।
3. पप्पू यादव का ‘सीमांचल कनेक्शन’: आरजेडी की टेंशन बढ़ी
बिहार की राजनीति में सीमांचल हमेशा से ही निर्णायक रहा है। इस बार यहाँ पप्पू यादव की सक्रियता ने आरजेडी को परेशान कर रखा है। पप्पू यादव, जिन्होंने कभी तेजस्वी के नेतृत्व को माना नहीं था, अब कांग्रेस-आरजेडी के साथ खड़े हैं।
अगर सीमांचल की सीटों पर पप्पू यादव को अलग से तवज्जो दी गई, तो आरजेडी की पकड़ ढीली होगी। सीटों के बँटवारे और खास वोट बैंक पर इसका असर पड़ना निश्चित है।
4. प्रियंका गांधी और ‘यूपी वाला फैक्टर’
राहुल गांधी के साथ अब प्रियंका गांधी वाड्रा भी प्रचार में उतर रही हैं। पर सवाल है कि बिहार में उनका जादू कितना चलेगा?
याद कीजिए, उत्तर प्रदेश चुनाव में राहुल-प्रियंका ने सपा के साथ प्रचार किया था, लेकिन नतीजा क्या रहा? कांग्रेस का प्रदर्शन बेहद खराब रहा। विपक्ष पहले से ही कह रहा है कि कांग्रेस सिर्फ ‘तमाशे वाली राजनीति’ कर रही है। अगर बिहार में भी यूपी वाली कहानी दोहराई गई, तो इसका सबसे बड़ा नुकसान तेजस्वी यादव को उठाना पड़ेगा।
नतीजा: गठबंधन की रस्सी पर तेजस्वी की सवारी
महागठबंधन की सबसे बड़ी कमज़ोरी उनका तालमेल है। राहुल गांधी के आने से कांग्रेस को बेशक राष्ट्रीय स्तर पर थोड़ी हवा मिली है, लेकिन आरजेडी के लिए यह दुविधा बनी हुई है कि क्या तेजस्वी को पूरा और अनकंडिशनल समर्थन मिलेगा।
अगर यह कन्फ्यूज़न (भ्रम) दूर नहीं हुआ और तेजस्वी यादव को खुले तौर पर CM फेस घोषित नहीं किया गया, तो भाजपा और जेडीयू इसका भरपूर फायदा उठाएँगे।
राजनीतिक पंडितों की मानें तो राहुल गांधी की सक्रियता कांग्रेस के लिए थोड़ी राहत ला सकती है, पर तेजस्वी यादव के लिए यह निश्चित तौर पर एक बड़ी चुनौती है, जिसे उन्हें बड़े ध्यान से हैंडल करना होगा।










