बिहार की राजनीति में इन दिनों सबसे बड़ी खबर भोजपुरी अभिनेता पवन सिंह की ‘घर वापसी’ को लेकर है। 2024 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी को बड़ा झटका देने वाले इस ‘पावर स्टार’ ने अब राष्ट्रीय लोक मोर्चा (RLM) प्रमुख उपेंद्र कुशवाहा से मुलाकात कर सारे गिले-शिकवे दूर कर लिए हैं। यह महज एक शिष्टाचार मुलाकात नहीं, बल्कि भारतीय जनता पार्टी (BJP) की 2025 विधानसभा चुनाव के लिए तैयार की गई रणनीतिक बिसात का सबसे अहम मोहरा है।
2024 की ‘राजनीतिक बगावत’: जब पवन सिंह ने बीजेपी को दिया दर्द
पवन सिंह का नाम सबसे पहले सुर्खियों में तब आया जब उन्होंने 2024 के लोकसभा चुनाव में काराकाट सीट से निर्दलीय ताल ठोक दी। यह सीट एनडीए गठबंधन के तहत उपेंद्र कुशवाहा को दी गई थी, लेकिन पवन सिंह ने बीजेपी के आदेशों को दरकिनार कर दिया था।
काराकाट का कड़वा सच:
- वोटों का बिखराव: पवन सिंह ने चुनाव में जबरदस्त प्रदर्शन करते हुए 2,74,723 वोट हासिल किए और दूसरे स्थान पर रहे।
- कुशवाहा की हार: उनकी इस बगावत के कारण एनडीए प्रत्याशी उपेंद्र कुशवाहा सिर्फ 2,53,876 वोट पाकर तीसरे नंबर पर फिसल गए।
- महागठबंधन को लाभ: वोटों के इस विभाजन का सीधा फायदा महागठबंधन के राजा राम सिंह कुशवाहा (CPI(ML)) को मिला, जिन्होंने जीत दर्ज की।
इस घटना के बाद पवन सिंह को भले ही बीजेपी से निष्कासित कर दिया गया, लेकिन पार्टी ने जल्द ही यह समझ लिया कि पवन सिंह की लोकप्रियता को हल्के में लेना शाहाबाद (भोजपुर, बक्सर, रोहतास, कैमूर) क्षेत्र में बड़ी राजनीतिक चूक साबित हो सकती है।
पवन सिंह का ‘वोटिंग पावर’: राजपूत समाज का अटूट विश्वास
पवन सिंह की राजनीतिक ताकत उनकी फैन फॉलोइंग और राजपूत समाज में उनकी गहरी पैठ है। उनकी पैन-बिहार पहचान है, लेकिन शाहाबाद के राजपूत मतदाताओं के बीच उनका असर किसी भी पारंपरिक नेता से कहीं ज्यादा है।
वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि:
”पवन सिंह भले ही पारंपरिक राजनीति के बड़े नेता न हों, लेकिन उनकी लोकप्रियता और राजपूतों के बीच की स्वीकार्यता उन्हें एनडीए के लिए अपरिहार्य बनाती है। शाहाबाद क्षेत्र में आर. के. सिंह के बाद वह राजपूत समाज के सबसे लोकप्रिय चेहरा हैं।”
बीजेपी को पता है कि 2025 के विधानसभा चुनाव में राजपूत वोट बैंक को एक जगह केंद्रित करना आवश्यक है, और यह काम सिर्फ पवन सिंह ही कर सकते हैं। 2024 में राजपूत वोटों के बँटवारे ने एनडीए को जो घाटा दिया, उसे अब 2025 से पहले ठीक करना बीजेपी की सबसे बड़ी प्राथमिकता है।
कुशवाहा-पवन सिंह की सुलह: BJP की ‘जातीय एकता’ की स्क्रिप्ट
पवन सिंह की वापसी का रास्ता सीधे उपेंद्र कुशवाहा के आवास से होकर गुजरा। यह मुलाकात बीजेपी की सुविचारित रणनीति का हिस्सा थी। बैठक के दौरान बिहार बीजेपी प्रभारी विनोद तावड़े और राष्ट्रीय मंत्री ऋतुराज सिन्हा की मौजूदगी ने यह साफ कर दिया कि यह आलाकमान के इशारे पर हो रहा है।
मुलाकात के पीछे का जातीय समीकरण:
- कड़वाहट को मिटाना: पवन सिंह ने उपेंद्र कुशवाहा के पैर छूकर आशीर्वाद लिया और गले मिले। इस भाव ने 2024 की सारी राजनीतिक शत्रुता को मिटाने का स्पष्ट संदेश दिया।
- राजपूत + कुशवाहा एकता: बिहार में राजपूत और कुशवाहा (कोइरी) समुदाय के वोटों का एक मंच पर आना एनडीए के लिए गेम चेंजर साबित हो सकता है। कुशवाहा समाज की आबादी भी बिहार में महत्वपूर्ण है।
- शाहाबाद को साधना: शाहाबाद का इलाका यादव, ब्राह्मण, राजपूत और कुशवाहा बहुल है। 2024 में इन जातियों के उलझे हुए समीकरण के कारण एनडीए कमजोर रहा। अब बीजेपी का लक्ष्य राजपूतों (पवन सिंह) और कुशवाहों (उपेंद्र कुशवाहा) को एक साथ लाकर इस क्षेत्र को फिर से मजबूत करना है।
- कुशवाहा की स्थिति मजबूत: इस सुलह से एनडीए के भीतर उपेंद्र कुशवाहा की राजनीतिक स्थिति भी मजबूत होगी। बीजेपी ने कुशवाहा को राज्यसभा भेजकर पहले ही सम्मानित कर दिया था, और अब यह कदम उनकी पार्टी को सीट बंटवारे में अधिक तवज्जो दिलवा सकता है।
पवन सिंह का ‘आगामी रोडमैप’: BJP में बड़ी भूमिका तय
उपेंद्र कुशवाहा से मुलाकात के बाद पवन सिंह ने गृह मंत्री अमित शाह और बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जे. पी. नड्डा से भी मुलाकात की। इन मुलाकातों की तस्वीरें शेयर करते हुए पवन सिंह ने साफ किया कि वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के सपनों के बिहार को बनाने में ‘पूरा पावर’ लगाएंगे।
आगे क्या हो सकता है?
- औपचारिक घर वापसी: जल्द ही पवन सिंह की बीजेपी में औपचारिक घर वापसी का ऐलान हो सकता है, जिससे उनका निष्कासन रद्द माना जाएगा।
- स्टार प्रचारक: उन्हें तत्काल प्रभाव से बीजेपी के स्टार प्रचारक की सूची में शामिल किया जाएगा।
- विधानसभा टिकट: राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि उन्हें 2025 के विधानसभा चुनाव में आरा या बक्सर जैसे राजपूत बहुल क्षेत्रों से टिकट दिया जा सकता है, या उन्हें किसी बड़ी संगठनात्मक जिम्मेदारी में भी शामिल किया जा सकता है।
फिलहाल, बीजेपी की यह चाल स्पष्ट करती है कि वह 2025 के चुनाव से पहले कोई जोखिम नहीं लेना चाहती और पवन सिंह की लोकप्रियता का इस्तेमाल राजपूत-कुशवाहा वोटों को एकजुट करने में करना चाहती है। अब देखना यह है कि बीजेपी की यह ‘महा-मुलाकात’ की स्क्रिप्ट बिहार की राजनीति में कितनी कारगर साबित होती है। यह राजनीतिक घटनाक्रम लगातार अपडेट हो रहा है, और बीजेपी के इस कदम पर आरजेडी (RJD) और जेडीयू (JDU) के शीर्ष नेताओं की प्रतिक्रिया का इंतजार है।











