बिहार विधानसभा चुनाव 2025 का माहौल दिन-ब-दिन गर्माता जा रहा है। सियासी गलियारों से लेकर गांव-गांव, चौपालों से लेकर शहर की गलियों तक हर तरफ चुनावी चर्चाएँ हैं। नेता विकास और वादों की लंबी फेहरिस्त लेकर जनता के बीच आ रहे हैं, लेकिन ज़मीनी हकीकत क्या है? इसका अंदाज़ा तब मिलता है जब आप उन बस्तियों में जाते हैं, जहां लोग सौ-सौ साल से रह रहे हैं लेकिन आज भी उनके पास पक्की सड़क, नाली, रोजगार और सुरक्षित छत जैसी बुनियादी सुविधाएँ नहीं हैं।
पूर्णिया ज़िले की ऐसी ही एक बस्ती में जब लोगों से बातचीत की गई तो उनका दर्द साफ झलकता है। यहां रहने वाले लोग कहते हैं कि “सरकारें आती-जाती रहीं, वादे होते रहे, लेकिन झुग्गियों का हाल वही का वही रहा।”
100 साल से बस्ती में रह रहे लोग, फिर भी उजाड़ने का प्रयास
पूर्णिया विधानसभा क्षेत्र की इस झुग्गी बस्ती में लोग लगभग 100 वर्षों से रह रहे हैं। इनका कहना है कि बार-बार उन्हें उजाड़ने का प्रयास किया जाता है। किसी समय पार्क बनाने के नाम पर, तो किसी समय विवाह भवन या व्यावसायिक जगह विकसित करने के नाम पर नोटिस दिया गया।
फूल देवी, जो यहीं की निवासी हैं, कहती हैं:
“विकास का नाम सिर्फ कागज़ पर है। विधायक विजय खेमका जी कभी झुग्गी में आकर नहीं देखते कि गरीब कैसे जी रहा है। उल्टा हमारी बस्ती तोड़ने की कोशिश की जाती है।”
“हम बोरा उठाकर खाते हैं, हमारी महिलाएँ दूसरों के घर बर्तन मांजती हैं”
यहां के लोगों के पास स्थायी रोजगार का कोई साधन नहीं है। पुरुष दिहाड़ी मजदूरी या बोरा उठाने का काम करते हैं, जबकि महिलाएँ दूसरों के घरों में चौका-बर्तन करती हैं।
एक बुजुर्ग व्यक्ति बताते हैं:
“हमारा बाल-बच्चा, हमारी बीवी सब मरवाड़ी के घर में चौका-बर्तन करके खाती है। यही सब काम करके गुज़ारा होता है। अगर हमें यहां से भगा देंगे तो हम कहां जाएंगे? गांव भेज देंगे तो रोज़गार कहां मिलेगा? पेट कैसे भरेगा?”
“जन सुराज ने बचाया, उसी को वोट देंगे”
बस्ती के लोग बताते हैं कि जब प्रशासन ने झुग्गी तोड़ने का अभियान चलाया था, तब जन सुराज पार्टी के कार्यकर्ता, प्रशांत किशोर और उनकी टीम लोगों के साथ खड़े रहे।
एक महिला ने कहा:
“पानी में खड़े होकर जन सुराज के लोग हमारे साथ रहे। उन्होंने हमारे घर को बचाया। इसलिए इस बार वोट हम सिर्फ जन सुराज को ही देंगे। बाकी सब नेता धोखेबाज निकले।”
यहां तक कि छोटे बच्चे और बुजुर्ग महिलाएँ भी जन सुराज पार्टी का नाम लेते हुए कहती दिखीं कि “अगर ये लोग नहीं होते तो हमारी झुग्गी कब की टूट चुकी होती।”
“सरकारें वादा करती हैं, लेकिन निभाती नहीं”
लोगों का गुस्सा इस बात पर है कि चाहे नीतीश कुमार की सरकार रही हो या पहले की अन्य सरकारें — किसी ने भी उनकी बुनियादी ज़रूरतों की ओर ध्यान नहीं दिया।
- बिजली तो मिलती है, लेकिन पानी की व्यवस्था नहीं है।
- नाली नहीं बनी, गंदा पानी गलियों में बहता रहता है।
- रोजगार का कोई ठोस साधन नहीं है।
- आवास योजना की बातें कागज़ों तक सीमित हैं।
लोग कहते हैं कि चुनाव के समय नेता हाथ जोड़कर वोट मांगने आते हैं, वादे करते हैं, लेकिन जीतने के बाद कोई वापस देखने तक नहीं आता।
शराबबंदी पर भी उठे सवाल
नीतीश सरकार की शराबबंदी नीति पर भी यहां सवाल खड़े किए गए। लोगों का आरोप है कि दारू और नशे का कारोबार प्रशासन की मिलीभगत से चल रहा है।
एक महिला ने कहा:
“सरकार कहती है कि दारू बंद है, लेकिन हकीकत यह है कि हर जगह शराब और स्मैक मिल रहा है। हमारे बच्चे नशे में बर्बाद हो रहे हैं। पहले शराब पीते थे तो घर का हाल खराब होता था, अब स्मैक और भी बड़ा संकट बन गया है।”
बस्ती के लोग जन सुराज को क्यों मानते हैं “भगवान”?
लोगों का कहना है कि जन सुराज पार्टी ने भले ही सत्ता न पाई हो, लेकिन संकट की घड़ी में उनके नेता और कार्यकर्ता ही खड़े रहे।
शांति देवी, एक बुजुर्ग महिला भावुक होकर कहती हैं:
“हमारे लिए जन सुराज भगवान है। बाकी नेता महलों में रहते हैं, लेकिन जन सुराज पानी में हमारे साथ खड़ा रहा। वही हमारे लिए भगवान है।”
चुनावी समीकरणों पर असर
पूर्णिया की इस बस्ती का उदाहरण बिहार के उन तमाम इलाकों का प्रतीक है, जहां गरीब और झुग्गी-झोपड़ी में रहने वाले लोग बार-बार आश्वासन पर ठगे गए हैं।
यहां की जनता साफ कह रही है कि इस बार उनका वोट उसी को जाएगा जिसने उनका घर बचाया है।
अगर ऐसी भावनाएँ बड़ी संख्या में लोगों में देखने को मिलती हैं, तो यह बिहार की चुनावी राजनीति में बड़ा बदलाव ला सकती हैं।
निष्कर्ष
पूर्णिया की झुग्गियों से उठती यह आवाज़ बिहार की राजनीति का आईना है। एक तरफ सत्ता पक्ष दावा करता है कि उसने बिजली, आवास और रोजगार की सुविधा दी है, तो दूसरी तरफ हकीकत यह है कि लोग अब भी झोपड़ी में रहते हैं, नाली और पानी की समस्या झेलते हैं, और रोज़ दिहाड़ी कर अपना पेट पालते हैं।
जन सुराज पार्टी के लिए लोगों का यह समर्थन बताता है कि जनता अब सिर्फ वादों से नहीं, बल्कि ज़मीनी साथ चाहती है।
आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या बिहार का यह असंतोष सत्ता परिवर्तन में तब्दील होता है या फिर वही पारंपरिक समीकरण दोहराए जाते हैं। लेकिन इतना तय है कि इस बार झुग्गियों से उठती आवाज़ चुनावी रणभूमि में गूंज रही है —
“जन सुराज ने बचाया, उसी को वोट देंगे।”










