बिहार 

3 साल के लिए ₹1 में 1050 एकड़ जमीन? अडानी प्रोजेक्ट पर छिड़ी सियासी जंग

On: September 26, 2025 3:12 PM
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बिहार में अडानी ग्रुप को 1050 एकड़ जमीन ₹1 सालाना लीज पर देने का मामला गरमाया, कांग्रेस ने आरोप लगाए, बीजेपी ने सफाई दी।
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बिहार की सियासत में इन दिनों गौतम अडानी के ग्रुप को लेकर फिर से उबाल आ गया है। मामला बिहार के भागलपुर जिले से जुड़ा है, जहाँ एक पावर प्लांट प्रोजेक्ट के लिए अडानी समूह को कथित तौर पर 1050 एकड़ ज़मीन केवल ₹1 सालाना लीज़ दर पर पूरे 33 सालों के लिए देने का दावा किया गया है। यह सनसनीखेज आरोप कांग्रेस पार्टी के प्रवक्ता और मीडिया विभाग के प्रमुख पवन खेड़ा ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में लगाया।

​खेड़ा का कहना है कि इस डील के तहत अडानी को केवल ज़मीन ही नहीं दी गई, बल्कि उस पर लगे 10 लाख से ज़्यादा आम, लीची और सागौन के बेशकीमती पेड़ भी सौंप दिए गए हैं। ज़ाहिर है, इस दावे ने किसानों के हितों और पर्यावरण से जुड़े कई गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं।

​लेकिन, क्या यह दावा सच है? और अगर हाँ, तो आख़िर सरकार ने ऐसा क्यों किया? इस पूरे विवाद ने कांग्रेस और बीजेपी के बीच आरोप-प्रत्यारोप की एक नई जंग छेड़ दी है।

​कांग्रेस का आरोप: किसानों की ज़मीन ‘औने-पौने दाम’ में

15 सितंबर को दिल्ली में हुई प्रेस कॉन्फ्रेंस में पवन खेड़ा ने ज़ोर देकर कहा कि बिहार सरकार ने किसानों की बहुमूल्य ज़मीन महज़ ₹1 सालाना शुल्क पर अडानी ग्रुप को लीज़ पर सौंप दी है। उन्होंने साफ तौर पर आरोप लगाया कि यह सौदा भागलपुर ज़िले के पीरपैती क्षेत्र में हुआ है।

​खेड़ा ने दावा किया कि इस ज़मीन पर लाखों की संख्या में फलदार और कीमती लकड़ी के पेड़ मौजूद हैं, जिनकी कीमत अरबों रुपये में आँकी गई है। उनके अनुसार, किसानों की सालों की मेहनत और उनकी आजीविका को औने-पौने दाम में “राष्ट्र सेठ” गौतम अडानी को दे दिया गया है।

​उन्होंने आगे कहा:

“यह कोई मामूली बात नहीं है। सरकार ने 1050 एकड़ ज़मीन, 10 लाख पेड़ और किसानों की रोज़ी-रोटी— सब कुछ अडानी को दे दिया है। यह तो देश के प्राकृतिक संसाधनों की एक तरह से खुल्लमखुल्ला लूट है।”

​”चुनाव से ठीक पहले ‘सौगात’ मिलती है अडानी को”

​कांग्रेस प्रवक्ता यहीं नहीं रुके। उन्होंने अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए आरोप लगाया कि यह पहली बार नहीं है जब अडानी ग्रुप को इस तरह के बड़े प्रोजेक्ट्स दिए गए हैं।

​उन्होंने कई उदाहरण पेश किए:

  • महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव से ठीक पहले अडानी को धारावी प्रोजेक्ट के साथ-साथ एक बड़ा पावर प्रोजेक्ट भी सौंपा गया।
  • झारखंड चुनाव से पहले गोड्डा पावर प्रोजेक्ट अडानी को दिया गया।
  • 2013 के छत्तीसगढ़ चुनाव से ठीक पहले हसदेव अरण्य प्रोजेक्ट भी अडानी ग्रुप को मिला।

​खेड़ा ने आरोप लगाया कि “हर बार चुनाव नज़दीक आते ही बीजेपी की सरकारें अडानी ग्रुप को कोई न कोई बड़ा प्रोजेक्ट तोहफे में दे देती हैं।”

​पावर प्रोजेक्ट की लागत और सरकार की भूमिका

​यह प्रोजेक्ट असल में केंद्र सरकार के बजट में घोषित किया गया था। रिपोर्ट्स के मुताबिक, यह 400 मेगावाट का बिजली प्रोजेक्ट है, जिसकी अनुमानित लागत लगभग ₹21,400 करोड़ बताई गई थी।

​हालांकि, शुरुआत में यह साफ़ नहीं किया गया था कि यह प्रोजेक्ट किसी निजी कंपनी को दिया जाएगा। अब जब अडानी ग्रुप को ज़मीन लीज़ पर देने की बात सार्वजनिक हुई है, तो यह सवाल उठ रहा है कि इतने बड़े निवेश में किसानों और राज्य के हितों का कितना ध्यान रखा गया है।

​बीजेपी का बचाव: “पूरी प्रक्रिया पारदर्शी थी”

​कांग्रेस के तीखे आरोपों के जवाब में बिहार बीजेपी ने सफ़ाई दी। पार्टी के मीडिया विभाग प्रमुख दानिश इकबाल ने कहा कि यह प्रोजेक्ट पूरी तरह से पारदर्शी और खुली प्रक्रिया के तहत अडानी ग्रुप को दिया गया है।

​उन्होंने अपना तर्क सामने रखा:

  • ​टेंडर प्रक्रिया पूरी तरह से खुली और निष्पक्ष थी।
  • ​अडानी कंपनी ने बाक़ी कंपनियों के मुक़ाबले सबसे कम दर पर बिजली उपलब्ध कराने का वादा किया है।
  • ​लगभग ₹28,000 करोड़ का पूरा निवेश अडानी ग्रुप ही करेगा।
  • ​सरकार ने केवल ज़मीन मुहैया कराई है ताकि निवेशक राज्य में आ सकें और उद्योगों को बढ़ावा मिल सके।

​दानिश इकबाल ने कहा:

“हमारा मुख्य लक्ष्य बिहार में उद्योगों को प्रोत्साहित करना है। अगर कोई कंपनी अरबों का निवेश कर रही है और सस्ती दर पर बिजली देने का वादा कर रही है, तो सरकार का फ़र्ज़ है कि वह उसे पूरा सहयोग दे। इसमें किसी तरह के भ्रष्टाचार या घोटाले का कोई सवाल ही नहीं उठता।”

​किसानों और पर्यावरण पर संभावित असर

​बहरहाल, इस विवाद का सबसे संवेदनशील पहलू किसानों और पर्यावरण से जुड़ा है।

​कांग्रेस का कहना है कि इस ज़मीन पर लगे पेड़ों को हटाना पर्यावरण को भारी नुकसान पहुँचाएगा और किसानों की जीविका प्रभावित होगी। वहीं, बीजेपी का कहना है कि “खाली ज़मीन पर पेड़-पौधे होना एक सामान्य बात है” और ये आरोप निराधार हैं।

​यह सवाल अभी भी बना हुआ है कि अगर ज़मीन सचमुच खेती योग्य थी और वहाँ फलदार पेड़ थे, तो किसानों को पर्याप्त मुआवज़ा कैसे दिया जाएगा? क्या इस प्रोजेक्ट से उन्हें कोई वास्तविक लाभ होगा?

​जनता के मन में उठते सवाल

​इस पूरे मामले ने बिहार की आम जनता के बीच कई बुनियादी सवाल खड़े कर दिए हैं:

  • ​क्या विकास के नाम पर किसानों की ज़मीन इतनी सस्ती दरों पर निजी कंपनियों को दे देना उचित है?
  • ​क्या सस्ती बिजली की दर का लाभ आम उपभोक्ताओं तक सचमुच पहुँचेगा?
  • ​अगर टेंडर प्रक्रिया इतनी पारदर्शी थी, तो अन्य बड़ी कंपनियों ने इसमें ज़्यादा उत्साह क्यों नहीं दिखाया?
  • 33 साल की यह लंबी लीज़ क्या राज्य के भविष्य को एक तरह से निजी कंपनियों पर निर्भर नहीं बना देगी?

​सियासी मायने

​यह मामला तब और गरमा गया जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ख़ुद बिहार के दौरे पर थे। कांग्रेस ने इसे एक बड़ा चुनावी मुद्दा बनाते हुए बीजेपी पर सीधा वार किया।

​राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह मुद्दा आने वाले चुनावों में बिहार की राजनीति को प्रभावित कर सकता है। जहाँ कांग्रेस इसे “किसानों और संसाधनों की लूट” के रूप में पेश कर रही है, वहीं बीजेपी इसे “राज्य के विकास की दिशा में एक बड़ा क़दम” बता रही है।

​निष्कर्ष

​अडानी ग्रुप को बिहार में ₹1 सालाना लीज़ पर 1050 एकड़ ज़मीन दिए जाने के आरोपों ने निश्चित रूप से एक नई सियासी बहस छेड़ दी है।

कांग्रेस का पक्ष है कि यह किसानों और पर्यावरण के लिए एक बेहद नुकसानदायक सौदा है, जबकि बीजेपी का दावा है कि यह राज्य में निवेश और विकास को आकर्षित करने की एक पारदर्शी पहल है।

​सच्चाई जो भी हो, यह मामला एक बार फिर उस बड़े और राष्ट्रीय महत्व के सवाल को सबके सामने लाता है:

👉 क्या भारत के संसाधन देश की आम जनता के व्यापक हित में उपयोग हो रहे हैं या वे धीरे-धीरे कुछ चुनिंदा बड़े उद्योगपतियों के हाथों में सिमटते जा रहे हैं?

Sachcha Samachar Desk

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