पश्चिमी चंपारण, बिहार। अरे भाई, क्या बताएं! आमतौर पर पुलिस शादी में आती है तो सबका दिल धक्-धक् करने लगता है, लगता है अब कोई बवाल होगा या दहेज वाले पकड़े जाएँगे। मगर इस दफ़ा तो मामला ही फ़िल्मी हो गया। यहाँ पुलिस खुद बाराती बनी, और हमारे पत्रकार भाई दूल्हा। और हाँ! इसी ‘नकली शादी’ के खेल में वो बड़े वाले फ़र्ज़ी दुल्हन गिरोह का पर्दाफाश हो गया जो महीनों से लोगों को चूना लगा रहा था।
यह कोई मनगढ़ंत कहानी नहीं है, ज़रा सुनिए, बात बिल्कुल सच्ची है। यकीन मानिए, जिसने भी यह ऑपरेशन सुना है, उसे पक्का बॉलीवुड के किसी थ्रीलर की याद आ गई होगी। सवाल ये है कि आख़िरकार ये शातिर गैंग काम कैसे करता था? और पुलिस और पत्रकारों ने मिलकर जान जोखिम में डालकर यह जाल कैसे बुना? आइए, सब कुछ विस्तार से देखते हैं। यह घटना बताती है कि मीडिया और प्रशासन का तालमेल कैसा होना चाहिए, है ना?
शुरुआत: एक छोटी सी एफ़आईआर, पर इरादे बड़े ख़तरनाक
तारीख़ थी 20 मई 2025। योगपट्टी थाना क्षेत्र में एक आदमी, नाम रामबाबू, रोते हुए पहुँचे। शिकायत क्या थी? उनकी नई-नवेली पत्नी शादी के सिर्फ़ दो महीने बाद घर के सोने-चाँदी, ज़ेवर और कैश लेकर रफ़ूचक्कर हो गई!
अब यह मामला पहले तो मामूली लगा, पर जब यह ख़बर दैनिक भास्कर के एक रिपोर्टर तक पहुँची, तो मामला गर्मा गया। रिपोर्टर साहब ने ज़मीन पर उतर कर तहक़ीक़ात शुरू की। अरे भाई, पता चला कि रामबाबू तो सिर्फ़ एक मोहरा हैं! यह तो एक पूरा गैंग है जो ‘दुल्हन’ बनाकर लोगों को लूट रहा था। अरे वाह! क्या काम है!
पत्रकारों ने कमर कसी और पुलिस से हाथ मिलाया
रिपोर्टरों ने जब ज़रा जोर लगाया, तो कई सारे पीड़ित सामने आए। सबकी कहानी हू-ब-हू एक जैसी! दुल्हन आती है, कुछ दिन रहती है, माहौल बनाती है, और फिर मौका देखकर फ़रार!
मामले की गंभीरता को समझते हुए, पत्रकारों ने तत्काल पुलिस अधिकारियों से बात की। तय हुआ: अब सीधा हमला होगा। एक स्टिंग ऑपरेशन! पत्रकार महोदय बनेंगे दूल्हा, महिला पुलिस अधिकारी बनेगी दूल्हे की बहन, और बाकी पुलिस के जवान? अरे भाई, वो सब बाराती बनकर जाएँगे! यह हुई न बात!
ऑपरेशन का खाका: नकली शेरवानी, असली इरादे
योजना पूरी तरह से गुप्त रखी गई थी, किसी को कानो-कान ख़बर नहीं लगी। महिला पुलिसकर्मियों को तो बस इतना बताया गया कि साड़ी-सूट पहनकर तैयार हो जाओ। पुरुष पुलिसकर्मी भी शानदार शेरवानी और कुर्ता-पायजामा में आ गए।
किसी को भी अंतिम क्षण तक पूरी जानकारी नहीं दी गई थी, ताकि भेद न खुल जाए। गैंग के साथ कई बार मुलाकात हुई और अंततः ₹35 लाख में शादी का फ़र्ज़ी सौदा तय हुआ। गैंग को पूरा यकीन हो गया कि असली पार्टी फँस गई है।
दिन दहाड़े ड्रामा: कोडवर्ड “सिंदूरदान” ने गेम पलटा!
शादी के दिन का माहौल! ज़बरदस्त! गाड़ियाँ सजी, ढोल-बाजे की जगह बाराती बने पुलिसवाले और पत्रकार! गैंग के लोग बार-बार जगह बदल रहे थे। मगर हमारी टीम पक्की थी।
आख़िरकार, दुल्हन को लाया गया। पूरी टीम को पहले से एक गुप्त कोडवर्ड बता दिया गया था: “सिंदूरदान”! जैसे ही पंडित जी यह शब्द बोलते, धावा बोल देना था।
और हाँ! वही हुआ। जैसे ही पंडित ने ‘सिंदूरदान’ कहा, तुरंत महिला पुलिस अधिकारियों ने दुल्हन को पकड़ लिया! बाकी पुलिसकर्मियों ने चारों ओर से गैंग के गुर्गों को घेर लिया। वाह! क्या नज़ारा होगा!
सबसे पहले सबके मोबाइल फ़ोन छीने गए! हाँ, ये बड़ा ज़रूरी था, कहीं ये फ़ोन करके अपने बाकी साथियों को न बुला लें। एक-एक करके सबको हिरासत में लिया गया। पता चला कि यह गिरोह सिर्फ़ बिहार में नहीं, पड़ोसी राज्यों में भी अपना गंदा खेल खेल रहा था।
समाज पर असर और मेरा अपना विचार
इस ऑपरेशन के बाद स्थानीय लोगों में पुलिस की छवि को लेकर एक पॉज़िटिविटी आई है। लोग कह रहे हैं, “अरे वाह! पुलिस अगर चाहे तो किसी भी वेश में अपराधियों तक पहुँच सकती है!”
लेकिन दोस्तों, एक गंभीर सवाल तो अपनी जगह है! आख़िर क्यों हमारे समाज में ऐसे फ़र्ज़ी गैंग पनपते हैं? मेरे हिसाब से, बेरोज़गारी, तेज़ी से पैसा कमाने की लालसा और ग्रामीण क्षेत्रों में शादी की परंपराओं की पेचीदगियों का फ़ायदा उठाना ही इन गुर्गों को ये सब करने पर मजबूर करता है।
अंत में, पश्चिमी चंपारण की यह कहानी महज़ एक अपराध का पर्दाफ़ाश नहीं है। यह बताती है कि पत्रकारिता की असली ताक़त और पुलिस का हौसला जब मिलता है, तो बड़े से बड़ा शैतान भी अपनी औक़ात पर आ जाता है। फ़र्ज़ी दुल्हन गैंग का अंत बताता है कि अपराध चाहे कितना भी शातिर क्यों न हो, सच्चाई हमेशा जीतती है!








