मधेपुरा (बिहार): बिहार के मधेपुरा जिले से एक ऐसी कलंक कथा सामने आई है जिसने पूरे राज्य को झकझोर कर रख दिया है। कर्ज वसूली के नाम पर मानवता को तार-तार करने वाली यह हृदय विदारक घटना न केवल कानून-व्यवस्था पर गंभीर सवाल उठाती है, बल्कि यह सोचने पर मजबूर करती है कि आखिर पैसे की हवस में इंसान किस दरिंदगी की हद तक गिर सकता है।
मौत और वसूली का खूनी खेल
मधेपुरा जिले के मुरलीगंज प्रखंड के मीरगंज गांव में 10 वर्षीय अंशु कुमारी की तबीयत अचानक बिगड़ गई थी। परिजनों के होश उड़ गए; वे जान बचाने की आस में तुरंत उसे अस्पताल ले जाने के लिए निकले। मगर, रास्ते में उन्हें जिस क्रूर घटना का सामना करना पड़ा, उसकी वजह से बच्ची की जिंदगी की डोर टूट गई और उसे बचाया नहीं जा सका।
परिवार के पास एक हीरो डीलक्स मोटरसाइकिल थी, जिसकी कुछ किस्तें बाकी थीं। परिजनों का आरोप है कि जब वे बच्ची को अस्पताल ले जा रहे थे, तभी कर्ज वसूली करने वाले लोग जल्लाद बनकर सामने आ गए। उन्होंने अस्पताल जाने वाली मोटरसाइकिल को बीच रास्ते में रोक लिया और अमानवीय तरीके से कहा कि पहले किस्त का पैसा चुकाओ, तभी आगे बढ़ने देंगे।
परिजनों ने हाथ जोड़कर गुहार लगाई कि बच्ची की हालत गंभीर है, पहले उसे अस्पताल पहुंचाने दें, बाद में किस्त चुका देंगे। लेकिन, आरोप है कि वसूली करने वालों के दिल में जरा भी दया नहीं आई, उन्होंने एक न सुनी। उन्होंने मोटरसाइकिल को बंधक बना लिया और तड़पते हुए परिवार को आगे बढ़ने नहीं दिया।
अफसोस की बात है, इसी दौरान बच्ची की हालत और बिगड़ गई और समय पर इलाज न मिल पाने की वजह से मासूम अंशु ने दम तोड़ दिया।
पूरे गांव में मातम और आक्रोश का सैलाब
इस दर्दनाक घटना के बाद पूरे इलाके में माहात्म पसर गया है। एक मासूम कली की मौत ने ग्रामीणों के गुस्से को भड़का दिया है। लोग कह रहे हैं कि अगर इंसानियत जिंदा होती तो शायद अंशु आज जिंदा होती।
ग्रामीणों का कहना है कि कर्ज वसूली करने वालों की ऐसी करतूतें अब आम होती जा रही हैं। आए दिन गांव-गांव में किस्त वसूली के नाम पर दबाव, धमकी और उत्पीड़न की खबरें सुनने को मिलती रहती हैं, लेकिन जिले का प्रशासन कान में तेल डाले बैठा रहता है।
सवालों के घेरे में जिला प्रशासन और सिस्टम
यह घटना जिला प्रशासन के लिए भी बड़ी चुनौती बनकर सामने आई है। ग्रामीणों का साफ आरोप है कि प्रशासनिक लापरवाही और कर्ज वसूली पर सही निगरानी न होने की वजह से ही ऐसी घटनाएं घट रही हैं।
स्थानीय लोगों ने प्रशासन से मांग की है कि इस मामले की निष्पक्ष जांच हो और दोषियों पर कड़ी से कड़ी कार्रवाई की जाए ताकि अन्य वसूली एजेंटों को एक कड़ा संदेश मिल सके।
कानून क्या कहता है और क्यों हो रही है अनदेखी?
यह मामला सिर्फ एक परिवार की त्रासदी नहीं है, बल्कि यह हमारे पूरे तंत्र पर सवाल खड़े करता है। क्या वसूली एजेंटों को इतना अधिकार मिल गया है कि वे किसी की जान तक ले लें? भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने साफ निर्देश दिए हैं कि कोई भी बैंक या माइक्रोफाइनेंस कंपनी कर्ज वसूली के नाम पर दबाव, धमकी या हिंसा का इस्तेमाल नहीं कर सकती। इसके बावजूद जमीनी स्तर पर हालात कुछ और ही तस्वीर पेश करते हैं।
कानून के जानकारों का स्पष्ट मत है कि अगर किसी परिजन की मौत इस तरह की आपराधिक परिस्थितियों में होती है, तो यह गैरकानूनी वसूली के साथ-साथ आपराधिक लापरवाही का गंभीर मामला है। दोषियों पर हत्या जैसी संगीन धाराओं में मुकदमा दर्ज होना चाहिए।
एक पिता की व्यथा: ‘अगर हमें रोकते नहीं, तो शायद मेरी बेटी बच जाती’
अंशु कुमारी के रोते-बिलखते पिता ने गहरा दुख व्यक्त करते हुए कहा, “हमने बहुत समझाया कि पहले बच्ची को अस्पताल ले जाने दें। लेकिन उन्होंने एक न सुनी। अगर हमें रोकते नहीं, तो शायद मेरी बेटी बच जाती।”
यह दर्द भरा शब्द सुनकर हर किसी का कलेजा दहल गया। गांव के लोग कहते हैं कि यह सिर्फ एक परिवार का दर्द नहीं है, बल्कि समाज के हर व्यक्ति को झकझोर देने वाली घटना है।
निष्कर्ष: इंसानियत की कीमत
मधेपुरा की यह घटना केवल एक बच्ची की मौत नहीं है, बल्कि यह हमारे समाज और सिस्टम पर गहरे सवाल खड़े करती है। जब पैसे की भूख इंसानियत से बड़ी हो जाए, तब समाज की आत्मा मर जाती है।
अब देखना यह होगा कि जिला प्रशासन और सरकार इस मामले को किस गंभीरता से लेती है। क्या दोषियों को कड़ी सजा मिलेगी या यह संवेदनशील मामला भी समय के साथ दब जाएगा? इस घटना ने पूरे देश को सोचने पर मजबूर कर दिया है कि कर्ज वसूली की व्यवस्था में मानवीय पहलू आखिर कहां गायब हो गया है।








