पटना, बिहार। ज़रा सोचिए, जिन हाथों में कभी देश की सुरक्षा की कमान थी, जिन कंधों पर सरहद की ज़िम्मेदारी थी, आज उन्हीं के ऊपर अपने ही शहर की पुलिस लाठियाँ बरसा रही है। यह कोई फिल्मी कहानी नहीं, बल्कि बिहार की राजधानी पटना में सोमवार को देखने को मिला भयावह मंज़र है, जहाँ डायल 112 सेवा के तहत कार्यरत पूर्व सैनिकों का गुस्सा सड़क पर फूट पड़ा।
इन जवानों का कसूर बस इतना था कि ये समान काम-समान वेतन और अपने हक के सम्मान की माँग कर रहे थे। लेकिन जवाब में उन्हें मिला — लाठीचार्ज, गाली-गलौज और अपमान। यह घटना सिर्फ एक विरोध-प्रदर्शन नहीं, बल्कि हमारे लोकतंत्र और संवेदनशीलता पर एक गहरा घाव है।
क्यों धधका यह आंदोलन?
डायल 112 सेवा में ये पूर्व सैनिक अपनी जान जोखिम में डालकर आपातकालीन सेवाएं देते हैं। लेकिन उनकी ज़िंदगी ‘कोल्हू के बैल’ जैसी हो गई है—काम उतना ही, मगर पहचान और दाम इतना कम कि गुज़ारा मुश्किल।
इनकी माँगें न्याय की कसौटी पर खरी उतरती हैं, मगर सरकार के कान पर जूं तक नहीं रेंग रही:
- पेट पर लात: इन्हें वर्षों से मात्र ₹700 की मामूली वेतन वृद्धि के सहारे रखा गया है, जबकि इन्हें स्थायी कर्मचारी का दर्जा तक नहीं मिला।
- असुरक्षित भविष्य: न नौकरी की सुरक्षा, न बीमा।
- शहादत का अपमान: सबसे दुखद यह है कि ड्यूटी के दौरान 16 बहादुर जवान अपनी जान गँवा चुके हैं, लेकिन उनके परिवारों को आज तक एक धेला तक मुआवज़ा नहीं मिला।
प्रदर्शनकारियों ने कई बार सरकार से मिन्नतें कीं, मगर हर बार उनके हाथ खाली आश्वासन ही लगे। जब पानी सिर से ऊपर चला गया, तो गर्दनी बाग के शांतिपूर्ण धरने को छोड़कर हज़ारों की संख्या में ये भाजपा प्रदेश कार्यालय पहुँचे।
जब सम्मान तार-तार हुआ: पुलिस पर संगीन आरोप
सोमवार को भाजपा कार्यालय के बाहर का माहौल जल्द ही रणभूमि में तब्दील हो गया। पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच भयंकर झड़प हुई। लेकिन जो आरोप पूर्व सैनिकों ने पुलिस पर लगाए हैं, वह सुनकर शर्म से सिर झुक जाता है।
प्रदर्शनकारियों का कहना है कि मौके पर मौजूद एक डीएसपी ने न सिर्फ लाठीचार्ज का हुक्म दिया, बल्कि पूर्व सैनिकों को मां-बहन की गालियाँ भी दीं। एक जवान ने अपनी व्यथा बताते हुए कहा, “हमने सरहद पर मौत से आँखें मिलाई हैं, मगर आज हमें अपने ही देश में गाली सुननी पड़ रही है। क्या हमने इसीलिए फौज की नौकरी की थी?” कुछ महिला अधिकारियों पर भी अपमानजनक शब्दों के इस्तेमाल के आरोप लगे हैं।
यह व्यवहार उन जवानों के साथ हुआ, जिन्होंने तिरंगे की आन के लिए अपनी जवानी खपा दी। उनका कहना है, “हम तिरंगे का अपमान कभी बर्दाश्त नहीं करेंगे। यह लड़ाई केवल वेतन की नहीं, यह हमारे आत्म-सम्मान की लड़ाई है।”
सरकार कहाँ है?
इस पूरे घटनाक्रम में सबसे बड़ा सवाल यह है कि सरकार की चुप्पी क्यों है?
प्रदर्शनकारियों ने साफ़ कहा है कि उनकी लड़ाई पुलिस से नहीं, बल्कि सरकार से है जो वादे करके मुकर गई है।
“अगर हमें ठोस आश्वासन मिल जाए, तो हम अभी धरना खत्म कर देंगे। लेकिन जब तक कोई बड़ा नेता हमसे मिलने नहीं आता और हमारी बात नहीं सुनता, हम सड़क पर डटे रहेंगे।”
इन पूर्व सैनिकों को केवल ₹14-15 हज़ार मासिक वेतन मिलता है। वे पूछते हैं, जब सामान्य सड़क दुर्घटना में भी मुआवज़ा मिलता है, तो देश की सेवा करते हुए जान देने वाले जवानों को क्यों अनाथ छोड़ दिया गया है?
निष्कर्ष: सत्ता का अहंकार और न्याय की पुकार
पटना का यह आंदोलन सत्ता के अहंकार और न्याय की पुकार के बीच की खाई को दिखाता है। शांति से अपने अधिकार माँग रहे पूर्व सैनिकों पर लाठी चलाना न सिर्फ अमानवीय है, बल्कि हमारे लोकतंत्र के मूल्यों का मज़ाक भी है।
सरकार को समझना होगा कि ये कोई साधारण कर्मचारी नहीं हैं; ये वे लोग हैं जिन्होंने देश को सर्वोपरि रखा है। उनकी मांगों को जल्द से जल्द सम्मानजनक तरीके से पूरा करना सरकार की नैतिक ज़िम्मेदारी है। वरना, यह असंतोष एक दिन बड़ा राजनीतिक तूफ़ान बनकर खड़ा हो सकता है।
क्या यह सही नहीं है कि जिन्होंने देश की रक्षा की, कम से कम उन्हें अपने घर में तो सम्मान और सुरक्षा मिलनी चाहिए?








