बिहार के मुंगेर जिले के बरबीघा स्थित श्रीकृष्ण रामरुचि (एसकेआर) कॉलेज में एक संदिग्ध मामला सामने आया है। कॉलेज परिसर से भारी-भरकम लोहे के ढक्कन गायब होने के बाद अब ‘स्क्रैप घोटाले’ की आशंका जताई जा रही है। करीब 2000 किलोग्राम वजन के ये ढक्कन कॉलेज के पुराने प्लांट का हिस्सा थे।
क्या है पूरा मामला?
एसकेआर कॉलेज के रसायन शास्त्र (Chemistry) विभाग के पीछे पुराने समय में एक ‘क्रैकिंग प्लांट’ बनाया गया था। इस प्लांट का इस्तेमाल प्रयोगशालाओं में गैस की सप्लाई के लिए होता था। गैस को सुरक्षित रखने के लिए यहाँ दो बड़े कुएँ बनाए गए थे, जिन्हें भारी लोहे के ढक्कनों से ढका गया था। इन्ही ढक्कनों के गायब होने से अब कॉलेज प्रशासन सवालों के घेरे में है।
सफाई के दौरान खुला राज
पिछले काफी समय से प्लांट के आसपास घनी झाड़ियाँ और जंगल उग आए थे, जिसके कारण किसी की नजर इस ओर नहीं गई। हाल ही में जब परिसर की सफाई की गई और झाड़ियाँ काटी गईं, तब पता चला कि कुओं के ऊपर लगे भारी लोहे के ढक्कन गायब हैं।
चोरी या मिलीभगत? उठ रहे हैं ये सवाल
इस घटना ने कॉलेज के पुराने प्रबंधन और कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं:
- चोरी हुई तो रिपोर्ट क्यों नहीं: यदि यह चोरी का मामला है, तो अब तक पुलिस में एफआईआर (FIR) दर्ज क्यों नहीं कराई गई?
- नीलामी की प्रक्रिया: यदि इन्हें कबाड़ (Scrap) के रूप में बेचा गया, तो क्या इसके लिए कोई कमेटी बनी थी या सरकारी नियमों के अनुसार नीलामी हुई?
- हिसाब-किताब का अभाव: अगर स्क्रैप बेचा गया, तो उसकी राशि कॉलेज के फंड या कैश बुक में दर्ज है या नहीं?
निरीक्षण में सामने आई गड़बड़ी
इस मामले का खुलासा तब हुआ जब मुंगेर विश्वविद्यालय के सीनेट सदस्य डॉ. कुंदन लाल कॉलेज का निरीक्षण करने पहुँचे थे। उन्होंने पिछले हिस्से में घूमते समय इन ढक्कनों को गायब पाया। उन्होंने तुरंत विश्वविद्यालय प्रशासन को पत्र लिखकर इस मामले की उच्चस्तरीय जांच कराने की मांग की है।
प्राचार्य का पक्ष
इस मामले पर कॉलेज के वर्तमान प्राचार्य प्रो. संजय कुमार का कहना है कि उन्हें इस बारे में कोई जानकारी नहीं है। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह घटना उनके कार्यकाल की नहीं है। प्राचार्य के अनुसार, पुराने कर्मचारियों से पूछताछ के बाद ही यह पता चल पाएगा कि वहाँ ढक्कन कब तक थे और वे कहाँ गए।
निष्कर्ष: सरकारी संपत्ति का इस तरह गायब होना एक गंभीर वित्तीय अनियमितता की ओर इशारा करता है। अब देखना यह है कि विश्वविद्यालय प्रशासन इस पर क्या कार्रवाई करता है।












