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मुंगेर: जय माता दी! 3 साल से सीने पर ‘कलश स्थापना’ कर रहा ये भक्त, अनोखी साधना देख दूर-दूर से आ रहे लोग; जानें कौन हैं विश्वजीत

On: September 26, 2025 2:01 PM
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मुंगेर, बिहार: नवरात्रि का त्योहार यानी मां शक्ति के चरणों में समर्पण का सबसे बड़ा मौका। हर भक्त इस समय अपनी आस्था और श्रद्धा से मां को खुश करने की कोशिश करता है, पर बिहार के मुंगेर से एक भक्त की कहानी ऐसी सामने आई है, जिसने भक्ति की परिभाषा ही बदल दी है। असरगंज प्रखंड के कमराय दुर्गा मंदिर में एक युवक ने मां दुर्गा के प्रति अपनी अटूट श्रद्धा दिखाने के लिए अपने सीने पर जल से भरा कलश स्थापित कर दिया है।

​यह कोई साधारण पूजा नहीं है। शंभूगंज के चटमा के रहने वाले 30 साल के विश्वजीत कुमार पिछले तीन साल से यह असाधारण और बेहद कठिन तपस्या कर रहे हैं। वह लगातार 9 दिनों तक बिना हिले-डुले, बिना अन्न-जल ग्रहण किए इसी अवस्था में लेटे रहते हैं। उनकी यह साधना साहस, त्याग और अटूट विश्वास की एक अद्भुत मिसाल बन गई है, जिसे देखने के लिए दूर-दराज के इलाकों से लोग इस मंदिर में पहुँच रहे हैं।

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तीन साल से जारी है यह ‘अग्नि परीक्षा’

​यह भक्ति का कोई क्षणिक आवेग (impulse) नहीं है, बल्कि विश्वजीत कुमार का एक दृढ़ संकल्प है। यह तीसरी बार है जब वह इस तरह की कठिन साधना कर रहे हैं। नवरात्रि शुरू होते ही वह मंदिर पहुँच जाते हैं और एक विशेष पूजा के बाद उनके सीने पर जल से भरा कलश स्थापित किया जाता है।

  • एक ही आसन (स्थिति): विश्वजीत इस दौरान एक ही जगह पर सीधे लेटे रहते हैं।
  • असाधारण भार: उनके सीने पर रखा कलश न केवल जल से भरा होता है, बल्कि उसे पूरे 9 दिनों तक स्थिर रखना होता है।
  • कठोर व्रत: पूरे 9 दिनों तक वह अन्न और जल का त्याग करते हैं। उनका यह तप शारीरिक और मानसिक दोनों स्तरों पर अविश्वसनीय है।

​ग्रामीणों का कहना है कि यह तपस्या आम लोगों के लिए करना लगभग असंभव है। इतनी देर तक एक ही अवस्था में रहना, और वह भी बिना कुछ खाए-पिए, मां दुर्गा के विशेष आशीर्वाद के बिना संभव नहीं हो सकता। उनकी इस साधना को देखने वाला हर व्यक्ति श्रद्धा से झुक जाता है।

मकसद मन्नत नहीं, केवल ‘मां की खुशी’

​दुनिया में हर कोई अपनी इच्छाएं पूरी करने के लिए भगवान की शरण में जाता है। लेकिन विश्वजीत की साधना का कारण जानकर आपको उनकी भक्ति की गहराई का अंदाज़ा होगा।

​जब उनसे पूछा गया कि वह मां से कौन सी मन्नत मांग रहे हैं, तो विश्वजीत ने बहुत ही सरल और शांत भाव से जवाब दिया:

​”मैं यह तपस्या किसी खास मनोकामना को पूरा करने के लिए नहीं कर रहा हूँ। मेरे दिल में मां दुर्गा के लिए बहुत श्रद्धा है। मुझे यह सब करके बेहद खुशी मिलती है। मैं बस चाहता हूँ कि मां की कृपा हमेशा हमारे परिवार पर बनी रहे और जीवन में सुख-शांति बनी रहे।”

 

​उनका यह निस्वार्थ प्रेम ही उनकी तपस्या को सबसे अलग और महान बनाता है। वह लौकिक सुख के बजाय आत्मिक सुख और मां के प्रति अपने समर्पण को प्राथमिकता देते हैं। यह उनकी भक्ति की पवित्रता को दर्शाता है।

परिजनों को है ‘मां की शक्ति’ पर पूरा भरोसा

​विश्वजीत की इस साधना में उनके परिवार की भूमिका भी बहुत महत्वपूर्ण है। उनकी पत्नी अवंतिका सिंह और परिवार के अन्य सदस्य इस तपस्या में उनका पूरा सहयोग करते हैं।

  • पत्नी अवंतिका सिंह ने बताया: “वह तीन साल से यह कर रहे हैं। उनके मन में कोई मन्नत नहीं है, सिर्फ श्रद्धा है। हमें पूरा विश्वास है कि मां दुर्गा की शक्ति ही उन्हें यह बल दे रही है। इसी शक्ति के कारण वह यह कठिन तपस्या पूरी कर पाते हैं।”
  • प्रधान पुजारी का कथन: कमराय दुर्गा मंदिर के प्रधान पुजारी भी मानते हैं कि विश्वजीत की यह साधना दैवीय शक्ति का प्रमाण है। इतनी बड़ी तपस्या को पूरा करने का सामर्थ्य केवल मां के आशीर्वाद से ही मिल सकता है।

​उनके परिवार के इस समर्पण और विश्वास से यह साफ होता है कि यह तपस्या केवल एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि पूरे परिवार की आस्था का प्रतीक है।

5 साल का संकल्प: भक्ति का ‘महाकुंभ’

​विश्वजीत ने इस साधना को सिर्फ तीन साल तक करने का फैसला नहीं लिया है, बल्कि उन्होंने कुल 5 साल तक यह तपस्या जारी रखने का संकल्प लिया है।

  • अब तक: यह उनका तीसरा साल है।
  • बाकी: अगले दो साल तक और वह इसी प्रकार नवरात्रि के दौरान अपने सीने पर कलश स्थापित कर साधना करेंगे।

​उनका यह दीर्घकालिक संकल्प बताता है कि वह अपनी भक्ति में कितने अडिग हैं। उनकी यह कहानी सनातन धर्म में तपस्या और त्याग की उस महान परंपरा को आगे बढ़ाती है, जो सदियों से चली आ रही है।

मुंगेर का यह मंदिर बना ‘आकर्षण का केंद्र’

​विश्वजीत की इस अनोखी भक्ति के कारण असरगंज का कमराय दुर्गा मंदिर इस नवरात्रि में चर्चा का केंद्र बन गया है।

  • दर्शनार्थियों की भीड़: बांका और आसपास के कई जिलों से लोग इस असाधारण दृश्य को देखने के लिए मंदिर पहुँच रहे हैं। हर कोई इस अटूट आस्था को नमन करना चाहता है।
  • भक्ति का संचार: मंदिर में आने वाले श्रद्धालुओं का कहना है कि विश्वजीत को देखकर उन्हें सच्ची भक्ति की प्रेरणा मिलती है।

​स्थानीय ग्रामीण अजय सिंह बताते हैं कि यह मंदिर करीब 25 साल पुराना है और यहां मां की कृपा हमेशा रही है। विश्वजीत की तपस्या ने इस मंदिर की ख्याति और बढ़ा दी है।

साधना पूरी होने तक क्या होता है?

​विश्वजीत की यह तपस्या पूरे 9 दिनों तक चलती है। इन दिनों में उनके सीने पर रखे कलश की भी मंदिर के अन्य अनुष्ठानों के साथ विधि-विधान से पूजा होती है।

  • नियमित पूजा: मंदिर के पुजारी और भक्त नियमित रूप से कलश का पूजन करते हैं।
  • जल ही जीवन: विश्वजीत इस दौरान जल पर ही रहते हैं, यानी 9 दिन तक वह कोई अन्न ग्रहण नहीं करते।
  • विश्राम: उनकी यह तपस्या दसवें दिन (दशमी) को कलश विसर्जन के बाद ही पूरी होती है।

​यह तपस्या हमें बताती है कि जब मनुष्य का विश्वास अटूट होता है, तो वह शारीरिक सीमाओं को भी पार कर जाता है।

निष्कर्ष: भक्ति की ऐसी मिसाल जो याद रखी जाएगी

विश्वजीत कुमार की यह कहानी सिर्फ एक खबर नहीं, बल्कि आस्था, साहस और समर्पण की एक जीवंत गाथा है। मुंगेर के असरगंज से निकली यह भक्ति की धारा आज पूरे देश को यह संदेश दे रही है कि निःस्वार्थ प्रेम में वह शक्ति है, जो सबसे कठिन तपस्या को भी सरल बना देती है। उनकी इस तपस्या को आने वाले वर्षों में भी भक्ति के महाउदाहरण के तौर पर याद रखा जाएगा।

Sachcha Samachar Desk

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