बिहार 

लोक अदालत से न्याय हुआ आसान: मुंगेर में 80 लाख की लागत से बने अधिवक्ता भवन का शुभारंभ

On: September 26, 2025 3:18 PM
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मुंगेर में राष्ट्रीय लोक अदालत का आयोजन, न्यायमूर्ति सुरेंद्र पांडे ने 80 लाख की लागत से बने अधिवक्ता भवन का उद्घाटन किया।
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मुंगेर, बिहार: मुंगेर जिला न्यायालय में इस बार की राष्ट्रीय लोक अदालत सचमुच एक ऐतिहासिक आयोजन बन गई। यह सिर्फ न्यायिक प्रक्रिया तक सीमित नहीं रही, बल्कि इसमें एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर भी स्थापित हुआ। पटना उच्च न्यायालय के माननीय न्यायमूर्ति सुरेंद्र पांडे न केवल इस लोक अदालत का उद्घाटन करने पधारे, बल्कि उन्होंने 80 लाख रुपये की लागत से तैयार किए गए तीन मंजिला अधिवक्ता भवन को भी जनता को समर्पित किया। इस अवसर पर न्यायालय के शीर्ष अधिकारियों से लेकर प्रशासनिक अमले, अधिवक्ता संघ के पदाधिकारी और बड़ी संख्या में स्थानीय लोग मौजूद रहे, जिससे पूरा माहौल गरिमामय और उत्साहपूर्ण हो गया।
इस आयोजन ने एक बार फिर यही संदेश दिया कि “न्याय सिर्फ कानूनी किताबों और अदालती फैसलों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह लोगों की आपसी सहमति और समझौते में भी उतनी ही मजबूती से संभव है।”
लंबित मामलों का समाधान: लोक अदालत की बढ़ती प्रासंगिकता
भारत के न्यायालयों में मुकदमों का अंबार लगा हुआ है। लाखों लोग वर्षों तक अपने मामलों के निपटारे के लिए अदालतों के चक्कर काटते रहते हैं, और इस देरी की वजह से न्याय पर से उनका भरोसा डगमगाने लगता है। इसी पृष्ठभूमि में, राष्ट्रीय लोक अदालत एक संजीवनी बनकर सामने आई है। यह एक ऐसा मंच है जहाँ आपसी सहमति से विवादों को तुरंत सुलझाया जा सकता है।
लोक अदालत की सबसे बड़ी खूबी इसका सरल और त्वरित स्वभाव है। यहाँ अपील की जटिलता नहीं है, लंबी सुनवाई का झंझट नहीं है और न ही अनावश्यक खर्च का बोझ। दोनों पक्ष एक साथ आते हैं और उनकी सहमति से तत्काल निपटारा हो जाता है।
इस बार मुंगेर में 11 न्यायिक पीठों और 13 अलग-अलग टेबलों पर विभिन्न प्रकार के मामलों को निपटाने की व्यवस्था की गई थी। इनमें बैंकिंग, बीमा क्लेम, बिजली-पानी के बिल, वैवाहिक विवाद, मोटर दुर्घटना क्लेम (MACT) और छोटे आपराधिक मामलों को सफलतापूर्वक सुलझाया गया।
आधुनिकता की ओर कदम: अधिवक्ता भवन का लोकार्पण
राष्ट्रीय लोक अदालत के उद्घाटन के साथ ही, 80 लाख रुपये की लागत से निर्मित अत्याधुनिक अधिवक्ता भवन का लोकार्पण भी किया गया। यह तीन मंजिला भवन मुंगेर के वकीलों और न्यायिक प्रक्रियाओं के लिए एक बड़ी सुविधा लेकर आया है। इस भवन में अधिवक्ताओं के लिए सुसज्जित कार्यालय, मीटिंग हॉल और एक आधुनिक पुस्तकालय जैसी सुविधाएँ उपलब्ध कराई गई हैं।
न्यायमूर्ति सुरेंद्र पांडे ने इस अवसर पर कहा कि यह नया भवन न केवल अधिवक्ताओं की कार्यशैली को आधुनिक और कुशल बनाएगा, बल्कि यह अप्रत्यक्ष रूप से न्यायिक व्यवस्था की गुणवत्ता को भी मजबूत करने का काम करेगा।
न्यायमूर्ति पांडे का प्रेरणादायक संबोधन
अपने सारगर्भित संबोधन में न्यायमूर्ति पांडे ने लोक अदालत के महत्व को रेखांकित करते हुए कई महत्वपूर्ण बातें कहीं।
उन्होंने स्पष्ट किया: “लोक अदालत की सबसे बड़ी खूबसूरती यही है कि यह किताबों की कानूनी जटिलताओं से ऊपर उठकर लोगों की आपसी सहमति और सद्भाव को प्राथमिकता देती है।”
उन्होंने जोर देकर कहा कि किसी भी विवाद का समाधान अगर आपसी समझौते से हो जाए, तो वह सबसे बड़ी जीत होती है। उन्होंने अपने न्यायिक अनुभव साझा करते हुए विशेष रूप से भूमि विवादों और पारिवारिक झगड़ों पर ध्यान दिलाया। उन्होंने कहा कि ऐसे मामले अक्सर वर्षों तक खिंचते रहते हैं, जबकि इन्हें काउंसलिंग और बातचीत के माध्यम से आसानी से निपटाया जा सकता है। न्यायमूर्ति ने चेतावनी दी कि अधिकांश आपराधिक घटनाओं की जड़ में कहीं न कहीं जमीन-जायदाद के छोटे-मोटे झगड़े ही होते हैं। यदि इन्हें शुरुआती चरण में ही समझौते से सुलझा लिया जाए, तो कई गंभीर अपराधों को रोका जा सकता है।
त्वरित न्याय से जनता को राहत
इस राष्ट्रीय लोक अदालत में हजारों की संख्या में लोगों को त्वरित न्याय मिला।
* बैंकिंग विवाद: कई कर्जदारों को ऋण अदायगी और सेटलमेंट में बड़ी राहत दी गई।
* बीमा दावे: लंबे समय से अटके पड़े बीमा दावों का तत्काल निपटारा किया गया।
* परिवारिक मामले: पति-पत्नी के बीच के जटिल विवादों और माता-पिता-बच्चों के बीच की खटास को बातचीत और काउंसलिंग के जरिए सफलतापूर्वक सुलझाया गया।
* मोटर दुर्घटना दावे (MACT): दुर्घटना में पीड़ित परिवारों को मुआवजा दिलाकर उन्हें आर्थिक सुरक्षा दी गई।
इन त्वरित निपटारों से न केवल आम जनता को बड़ी राहत मिली, बल्कि न्यायपालिका पर से भी मुकदमों का बोझ काफी हद तक कम हुआ।
सामाजिक दृष्टिकोण: समझौते की सीख
लोक अदालतें सिर्फ कानूनी मंच नहीं हैं, बल्कि ये समाज को ‘आपसी समझौते और सहयोग’ का महत्वपूर्ण पाठ भी पढ़ाती हैं। यह मंच लोगों को एहसास कराता है कि अदालतों की लंबी और थकाऊ लड़ाई लड़ने से कहीं बेहतर है कि विवादों का त्वरित और सौहार्दपूर्ण तरीके से निपटारा कर लिया जाए।
लोक अदालत की कार्यवाही में न कोई हारता है और न कोई जीतता है—बल्कि दोनों पक्ष समझौते से लाभान्वित होते हैं। यह प्रक्रिया न केवल समय और पैसे की बचत करती है, बल्कि रिश्तों में आई खटास को भी दूर करने में सहायक होती है।
अधिकारियों और अधिवक्ताओं की राय
जिला एवं सत्र न्यायाधीश आलोक गुप्ता ने लोक अदालत को आम जनता के लिए न्याय तक पहुँचने का सबसे सरल और सीधा रास्ता बताया। वहीं, परिवार न्यायालय के प्रधान न्यायाधीश अरविंद कुमार शर्मा ने इसे समाज में शांति और सौहार्द स्थापित करने का एक प्रभावी माध्यम करार दिया। अधिवक्ता संघ के अध्यक्ष शशेखर सिंह और महासचिव रानी कुमारी ने भी नए अधिवक्ता भवन पर संतोष व्यक्त करते हुए कहा कि इससे वकीलों को एक बेहतर कार्यस्थल मिलेगा, जिससे न्याय प्रक्रिया में और तेज़ी आएगी।
भविष्य की राह और निष्कर्ष
मुंगेर में आयोजित इस राष्ट्रीय लोक अदालत ने देश के अन्य जिलों के लिए एक सकारात्मक मिसाल पेश की है। यदि इस तरह की पहल को राष्ट्रीय स्तर पर और अधिक सक्रियता से लागू किया जाए, तो लाखों लंबित मामलों का समाधान हो सकता है। इससे आमजन का विश्वास न्यायपालिका पर और मजबूत होगा और सामाजिक सौहार्द भी बढ़ेगा।
न्यायमूर्ति सुरेंद्र पांडे के शब्दों में कहें तो: “एक मुट्ठी जमीन के लिए अगर कोई व्यक्ति अपनी बड़ी संपत्ति या वर्षों का समय गंवा दे, तो उसका कोई औचित्य नहीं है। आपसी समझौता ही किसी भी विवाद का असली और टिकाऊ समाधान है।”
मुंगेर का यह सफल आयोजन यह स्पष्ट भरोसा दिलाता है कि न्याय अब केवल दूर की बात नहीं रही;

Sachcha Samachar Desk

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