मुंबई। ज़रा सोचिए, आखिरी बार कब ऐसा हुआ कि आप सिनेमाघर में बैठे हों और स्क्रीन पर चल रहे किरदारों की मस्ती देखकर आपको उनसे ज़्यादा मज़ा आ रहा हो?
यह सवाल शायद आपको सोचने पर मजबूर करे, पर इस हफ्ते रिलीज़ हुई जॉली एलएलबी 3 ने उसी खाली जगह को भर दिया है। यह सिर्फ एक फिल्म नहीं है, बल्कि एक सिनेमाई दावत है, जहाँ हर किरदार अपनी प्लेट पर मज़ा परोस रहा है और दर्शक चटकारे ले रहे हैं।
2013 में आई थी ‘जॉली एलएलबी’। फिर चार साल बाद, 2017 में ‘जॉली एलएलबी 2’। और अब पूरे आठ साल बाद, इस फ्रैंचाइज़ी की तीसरी किस्त लौटी है—लेकिन इस बार दाँव दोगुने हैं। कहानी में एक ज़बरदस्त ‘ट्विस्ट’ है: जॉली बनाम जॉली। जी हाँ, अरशद वारसी का ‘देसी’ जॉली और अक्षय कुमार का ‘कानपुरी’ जॉली, दोनों आमने-सामने, अदालत के अखाड़े में।
⚖️ अदालत के जंगल में दो शेर
दरअसल, फिल्म उसी सनातन सवाल को एक नए ‘कोर्टरूम’ लिबास में पेश करती है—गद्दी का असली हक़दार कौन है? सदियों पहले यह लड़ाई तलवारों से लड़ी जाती थी, आज कागज़ और दलीलों से लड़ी जा रही है।
- जॉली त्यागी (अरशद वारसी): मेरठ की गलियों से निकला वह वकील, जिसने अमीरों की हेकड़ी तोड़ी और हर बार ग़रीबों की ढाल बना। उसकी आँखों में ईमानदारी की चमक है, भले ही तरीका थोड़ा ‘देसी’ हो।
- जॉली मिश्रा (अक्षय कुमार): कानपुर का ‘चालाक’ वकील, जो अपनी तेज़-तर्रार बुद्धि से पुलिस को ही कठघरे में खड़ा करके केस को पलट देता है। उसके हर दाँव में एक व्यावसायिक चालाकी है।
सवाल बस इतना है कि कोर्ट यानी ‘जंगल’ में इन दो शेरों में से शिकार कौन करेगा? और क्या एक जंगल में दो शेर एक साथ रह सकते हैं?
🐐 एक बकरी—पर कहानी पूरी फिल्मी
अब ज़रा मज़ा देखिए। दो-दो धाकड़ वकील आपस में भिड़ रहे हैं, और उनका केस क्या है? एक बकरी का!
सुनने में यह किसी मज़ाक का हिस्सा लगेगा, लेकिन यहीं पर इस फिल्म की असली रचनात्मकता उभरती है। यह सिर्फ ‘इंसाफ’ की बात नहीं करती, बल्कि उस सोच पर चोट करती है कि क्या न्याय सिर्फ इंसानों का जन्मसिद्ध अधिकार है? क्या किसी जानवर को भी उतना ही हक़ नहीं मिलना चाहिए?
शुरुआत में यह प्लॉट ‘हल्का’ लगता है, पर जैसे-जैसे बहस आगे बढ़ती है, यह दर्शकों को अंदर तक झकझोरता है और सोचने पर मजबूर कर देता है कि हम अपनी छोटी-सी दुनिया से बाहर क्यों नहीं देखते।
👨⚖️ जज साहब की ‘कमबैक’ सेंचुरी
याद हैं पहली फिल्म के वो तुनकमिज़ाज मगर दिल के साफ़ जज साहब (सौरभ शुक्ला)? जिन्हें क्लाइमेक्स में हार्ट अटैक आ गया था? तो इस बार उनकी जोरदार वापसी हुई है। मज़ेदार बात ये है कि उन्हीं के सामने ये दोनों ‘जॉली’ अपने-अपने दाँव फेंकते हैं।
उनका अंदाज़ अब भी वही है—कभी उनकी ‘वन-लाइनर्स’ आपको ठहाके लगाने पर मजबूर करेंगी, कभी उनका गुस्सा कोर्टरूम की हवा को भारी कर देगा, और कभी उनकी आँखें इमोशनल होकर पूरी बहस का ‘एहसास’ करा देंगी। वे सचमुच कोर्टरूम को एक जीवित, साँस लेता हुआ किरदार बना देते हैं।
🎭 हास्य, रहस्य और ह्रदय का मिक्सचर
फिल्म की ‘टोन’ एक जगह स्थिर नहीं रहती, और यही इसकी खासियत है।
- पहले हाफ में एक रहस्य का पर्दा धीरे-धीरे उठता है कि आख़िर यह ‘बकरी’ वाला केस है क्या।
- बीच-बीच में अक्षय और अरशद की जुगलबंदी से उपजी कॉमेडी माहौल को हल्का कर देती है।
- और क्लाइमेक्स तक पहुँचते-पहुँचते कहानी पूरी तरह से ‘दिल छूने वाली’ हो जाती है।
यह फिल्म शायद ‘इंटेलिजेंट सिनेमा’ की ऊँची श्रेणी में न रखी जाए, लेकिन यह पक्का भावनात्मक और मनोरंजक सिनेमा है। यह आपके दिमाग को कम और आपके दिल को ज्यादा छूती है।
💬 गूँजने वाले डायलॉग्स
’जॉली’ सीरीज़ की पहचान हमेशा उसके धारदार और ज़िंदगी से जुड़े डायलॉग्स रहे हैं। इस बार भी कुछ लाइनें ऐसी हैं जो सिनेमाघर से बाहर निकलने के बाद आपके दिमाग में घर कर जाती हैं।
गजराज राव के हिस्से में आया एक डायलॉग बेहद मार्मिक है:
“गरीबी बहुत बुरी चीज़ है। उसे ग्लोरिफाई नहीं करना चाहिए।”
यह एक लाइन न सिर्फ़ पर्दे पर बल्कि असली ज़िंदगी के फलसफे पर भी सोचने को मजबूर करती है।
😂 अक्षय बनाम अरशद – असली विनर कौन?
सबसे बड़ा सवाल तो यही था कि इस महामुकाबले में किसने बाज़ी मारी?
- अक्षय कुमार: उनकी कॉमेडी टाइमिंग, हाजिरजवाबी और कोर्टरूम में उनकी तेज़ वकालत देखने लायक है। वे अपने किरदार को एक ‘कानपुरी’ चुलबुलापन देते हैं।
- अरशद वारसी: उनका ‘जॉली’ ज़्यादा ज़मीन से जुड़ा हुआ, थोड़ा मासूम और कई जगहों पर बेहद इमोशनल लगता है। वे अपने किरदार की सादगी से दिल जीत लेते हैं।
दोनों अभिनेताओं का प्रदर्शन इतना सशक्त है कि किसी एक को ‘विनर’ कहना अन्याय होगा। वे एक-दूसरे के पूरक बने हैं—एक की चालाकी दूसरे की सादगी को उभारती है।
🎬 क्लाइमेक्स का मास्टरस्ट्रोक
फिल्म का सबसे बड़ा ‘हाईलाइट’ और भावनात्मक चरम बिंदु है इसका क्लाइमेक्स।
यहाँ, सीमा विश्वास एक ऐसा ‘सीक्वेंस’ करती हैं, जहाँ बिना एक भी डायलॉग बोले, पूरी कहानी का सार, इंसाफ का असली मतलब और इंसानियत का पाठ समझा दिया जाता है।
वह ‘एक बकरी’ और उसके इर्द-गिर्द बुना गया इंसाफ का सवाल—यह दृश्य थिएटर में सन्नाटा ला देता है। हँसी-ठिठोली गायब हो जाती है और हर कोई चुपचाप स्क्रीन को देखता रह जाता है। यह एक ‘मास्टरस्ट्रोक’ है।
🌟 सपोर्टिंग कास्ट की चमक
गजराज राव फिल्म के सबसे मज़बूत स्तंभों में से एक हैं। उनका किरदार भले ही नकारात्मक हो, लेकिन हर सीन में उनकी उपस्थिति, उनकी ‘बॉडी लैंग्वेज’ और संवाद अदायगी गजब की है।
वहीं, अमृता राव को लंबे अंतराल के बाद देखना उनके प्रशंसकों के लिए एक तोहफा है। उनका ‘स्क्रीन टाइम’ बहुत लंबा नहीं है, पर उनकी गरिमामय मौजूदगी कहानी को एक भावनात्मक संतुलन देती है।
📊 कहाँ थोड़ी कमी रह गई?
फ़िल्म में इतने शानदार पल होने के बावजूद, कुछ कमज़ोरियाँ भी हैं जिन पर ध्यान जाना ज़रूरी है।
- मुख्य कोर्ट केस में वह ‘धार’ या जटिलता थोड़ी कम है, जो पहले के पार्ट्स को ज़बरदस्त बनाती थी।
- ’जॉली वर्सेस जॉली’ का ‘कॉन्सेप्ट’ जिस ‘पोटेंशियल’ तक एक्सप्लोर किया जा सकता था, शायद स्क्रिप्ट वहाँ तक नहीं पहुँची।
- कहीं-कहीं स्क्रिप्ट खिंची हुई लगती है, जैसे कुछ सीन सिर्फ कॉमेडी के लिए डाले गए हों।
⭐ हमारा फ़ैसला
रेटिंग की बात करें तो फिल्म को 5 में से 3 स्टार्स दिए जा सकते हैं।
प्लस पॉइंट्स:
- दोनों लीड एक्टर्स की ज़ोरदार एक्टिंग
- कोर्टरूम के डायलॉग्स में मज़ाकिया और भावनात्मक मिश्रण
- क्लाइमेक्स का ज़बरदस्त इमोशनल इम्पैक्ट
माइनस पॉइंट्स:
- केस स्टडी थोड़ी कमज़ोर
- दर्शकों की उम्मीद के मुताबिक ‘एग्जीक्यूशन’ में थोड़ी कमी
फिलहाल, थिएटर में जॉली बनाम जॉली की यह ज़बरदस्त गहमागहमी ज़ारी है। दर्शकों की भीड़ यह साबित करती है कि भारत को आज भी अच्छे कोर्टरूम ड्रामा से कितना लगाव है, भले ही केस एक बकरी का ही क्यों न हो!












