बिहार के मुंगेर जिले में गुरुवार से 102 एंबुलेंस कर्मी अनिश्चितकालीन हड़ताल पर चले गए हैं। सदर अस्पताल परिसर में दर्जनों एंबुलेंस खड़ी कर कर्मियों ने जोरदार प्रदर्शन किया। हड़ताल के चलते जिले की स्वास्थ्य सेवाओं पर सीधा असर पड़ा है, खासकर उन मरीजों पर जो आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग से आते हैं और सरकारी एंबुलेंस सेवा पर ही निर्भर रहते हैं।
सूत्रों के अनुसार, जिले में कुल 29 एंबुलेंस (छोटी और बड़ी मिलाकर) संचालित हैं। इन सभी गाड़ियों के बंद रहने से अस्पतालों तक मरीजों की आवाजाही प्रभावित हो रही है। ग्रामीण इलाकों से आने वाले मरीजों को खुद अपने खर्च पर निजी वाहनों का सहारा लेना पड़ रहा है।
क्यों गए हड़ताल पर कर्मी?
हड़ताल पर बैठे एंबुलेंस कर्मियों का कहना है कि कंपनी द्वारा उनके साथ लगातार श्रम कानूनों का उल्लंघन किया जा रहा है। बिहार राज्य 102 एंबुलेंस कर्मचारी संघ की जिला इकाई ने स्पष्ट किया कि राज्य स्वास्थ्य समिति, शेखपुरा और चिकित्सा हेल्थ केयर लिमिटेड के बीच हुए अनुबंध के अनुसार कर्मचारियों को न्यूनतम मजदूरी और अन्य सुविधाएं मिलनी चाहिए, लेकिन कंपनी इन शर्तों का पालन नहीं कर रही है।
कर्मचारियों ने अपनी तीन प्रमुख मांगें सामने रखी हैं:
- श्रम अधिनियम के तहत वेतन एवं अन्य सुविधाएं दी जाएं।
- अतिरिक्त कार्य का अतिरिक्त भुगतान किया जाए।
- हर माह तय समय पर वेतन और वेतन पर्ची (पे स्लिप) उपलब्ध कराई जाए।
इसके अलावा कर्मचारियों ने गाड़ी खराब होने पर वेतन रोकने और समय पर मरम्मत नहीं करने का भी विरोध किया। उनका कहना है कि जब तक गाड़ी ठीक नहीं होती, कंपनी उन्हें घर बैठा देती है लेकिन उस अवधि का वेतन नहीं देती।
बीमा और पीएफ को लेकर भी नाराज़गी
कर्मचारियों ने यह भी आरोप लगाया कि उन्हें न तो सही तरीके से बीमा की सुविधा दी गई है और न ही भविष्य निधि (पीएफ) की जानकारी स्पष्ट रूप से मिल रही है।
संघ के सदस्यों ने लखीसराय जिले की घटना का जिक्र करते हुए कहा कि हाल ही में एक चालक की मृत्यु हो गई थी, लेकिन कंपनी ने परिवार को मात्र ₹25,000 का मुआवजा दिया। उनका कहना है कि इस स्थिति में कम से कम ₹35 लाख का बीमा होना चाहिए ताकि परिजनों को सहारा मिल सके।
कर्मियों की नाराज़गी का स्वर
हड़ताल पर बैठे कर्मियों ने कहा कि उन्हें 12 घंटे की ड्यूटी के बदले मात्र ₹379 प्रतिदिन का भुगतान किया जाता है, जबकि सरकार द्वारा तय न्यूनतम मजदूरी का भी पालन नहीं हो रहा।
जिला सचिव सदानंद कुमार (ईएमटी) ने कहा –
“हमारी मांग बहुत सीधी है। सरकार और कंपनी के बीच हुए एग्रीमेंट के अनुसार हमें न्यूनतम मजदूरी और सुविधाएं मिलनी चाहिए। लेकिन आज तक ऐसा नहीं हुआ। हम महीने भर कड़ी मेहनत करते हैं, फिर भी सही वेतन और पे स्लिप नहीं मिलती। जब तक हमारी मांगें पूरी नहीं होंगी, हम हड़ताल खत्म नहीं करेंगे।”
कंपनी और प्रशासन की कोशिश
सूत्रों के मुताबिक, कंपनी के अधिकारी लगातार हड़ताल पर गए कर्मचारियों से बातचीत की कोशिश कर रहे हैं। वहीं प्रशासन की चिंता यह है कि सेवा ठप होने से जिले के स्वास्थ्य ढांचे पर भारी दबाव बढ़ रहा है।
सदर अस्पताल के डॉक्टरों का कहना है कि अगर एंबुलेंस सेवा तुरंत शुरू नहीं हुई तो गंभीर मरीजों को समय पर अस्पताल तक लाना मुश्किल हो जाएगा। खासकर गर्भवती महिलाएं और दुर्घटना के शिकार मरीजों को इसका सीधा खामियाजा भुगतना पड़ सकता है।
मरीजों की बढ़ी परेशानी
हड़ताल का असर मरीजों और उनके परिजनों पर साफ दिख रहा है। कई मरीजों ने बताया कि उन्हें निजी गाड़ियों का सहारा लेना पड़ा, जिसके लिए उन्हें कई गुना ज्यादा पैसे खर्च करने पड़े। ग्रामीण इलाकों से आने वाले गरीब मरीजों के लिए यह स्थिति और भी गंभीर है।
एक मरीज के परिजन ने कहा –
“हम गरीब लोग हैं। निजी गाड़ी का किराया ₹1000 से ₹1500 तक देना पड़ रहा है। अगर सरकारी एंबुलेंस चल रही होती तो मुफ्त या नाममात्र खर्च में हम अस्पताल पहुंच जाते।”
आगे की राह
कंपनी और कर्मचारी संघ के बीच बातचीत का सिलसिला जारी है। हालांकि अब तक किसी नतीजे पर सहमति नहीं बन पाई है। कर्मचारी अपनी मांगों पर अड़े हुए हैं और कंपनी श्रम कानून के पालन से जुड़ी समस्याओं पर खुलकर कुछ नहीं कह रही।
प्रशासनिक सूत्रों का कहना है कि अगर स्थिति जल्द नहीं सुधरी तो जिला प्रशासन हस्तक्षेप कर सकता है और आपातकालीन कदम उठाए जा सकते हैं।
विशेषज्ञों की राय
श्रम कानून विशेषज्ञों का मानना है कि अगर कंपनी ने सरकार के साथ अनुबंध किया है तो न्यूनतम मजदूरी और बीमा जैसी बुनियादी सुविधाएं देना उसकी जिम्मेदारी है। वहीं, स्वास्थ्य क्षेत्र से जुड़े जानकार कहते हैं कि इस तरह की हड़तालें सीधा मरीजों की जान पर असर डालती हैं, इसलिए राज्य सरकार को तत्काल समाधान निकालना चाहिए।
निष्कर्ष
मुंगेर में 102 एंबुलेंस कर्मियों की हड़ताल ने एक बार फिर स्वास्थ्य व्यवस्था की कमजोरियों को उजागर कर दिया है। जहां एक ओर कर्मचारी अपने हक और अधिकार की लड़ाई लड़ रहे हैं, वहीं दूसरी ओर मरीज और उनके परिजन इस जद्दोजहद का खामियाजा भुगत रहे हैं।
अब देखना यह होगा कि सरकार, कंपनी और कर्मचारी संघ के बीच कब और कैसे समझौता होता है। लेकिन इतना तय है कि जब तक मांगें पूरी नहीं होतीं, मुंगेर की एंबुलेंस सेवा ठप रहेगी और मरीजों की परेशानी कम नहीं होगी।








