बिहार के भागलपुर शहर का प्रतिष्ठित सुंदरवती महिला कॉलेज (एसएम कॉलेज) इस समय गहरे विवादों में है। कॉलेज की छात्राओं ने परिसर को पूरी तरह से बंद करके एक ज़ोरदार विरोध प्रदर्शन किया है। छात्राओं का स्पष्ट आरोप है कि कॉलेज प्रशासन लगातार उनकी बुनियादी ज़रूरतों और सुविधाओं को नज़रअंदाज़ कर रहा है। उनकी मानें तो, जब उनकी हर गुहार अनसुनी कर दी गई, तब मजबूरन उन्हें यह विरोध का रास्ता अपनाना पड़ा।
छात्राओं का गुस्सा क्यों भड़का?
कॉलेज की छात्राएं साफ तौर पर कह रही हैं कि वे किसी ‘लग्ज़री’ की मांग नहीं कर रहीं, बल्कि शिक्षा के लिए न्यूनतम आवश्यक चीज़ें चाहती हैं। उनकी मुख्य शिकायतें कॉलेज की दयनीय व्यवस्था पर केंद्रित हैं:
- पानी की गंभीर समस्या: परिसर में पीने के पानी का कोई उचित इंतज़ाम नहीं है।
- शौचालयों की बदहाली: कई शौचालयों में कुंडी तक नहीं लगी है, और सफाई व्यवस्था न के बराबर है। महिला कॉलेज होने के बावजूद, सबसे ज़रूरी सैनेटरी वेंडिंग मशीन की सुविधा भी नदारद है।
- खेलकूद की उपेक्षा: खेल में रुचि रखने वाली छात्राओं के लिए बैडमिंटन, बॉल या यहाँ तक कि कोच जैसी बुनियादी स्पोर्ट्स सामग्री भी उपलब्ध नहीं कराई गई है।
- सुरक्षा और प्रशासन का ख़राब रवैया: छात्राओं का दावा है कि जब वे अपनी समस्याओं को उठाती हैं, तो उन्हें धमकी दी जाती है कि उनके नंबर काट लिए जाएंगे या अटेंडेंस कम कर दी जाएगी।
एक प्रदर्शनकारी छात्रा ने गहरे आक्रोश में कहा, “हम पढ़ने के लिए आते हैं। अगर पानी, शौचालय और पढ़ाई के लिए बेसिक चीज़ें भी नहीं मिलेंगी, तो हम यहाँ कैसे पढ़ें? हमें पहले सुविधाएँ चाहिए, उसके बाद ही पढ़ाई हो पाएगी।”
एडमिट कार्ड और भविष्य पर संकट
विरोध का एक बड़ा कारण परीक्षा और दस्तावेज़ से जुड़ी चिंताएँ हैं।
- सर्टिफिकेट रोकने का आरोप: कुछ छात्राओं का कहना है कि कॉलेज ने उनके प्रोविजनल और आईटी सर्टिफिकेट रोक रखे हैं, जबकि बाकी छात्रों को दे दिए गए हैं। इससे वे अपनी आगे की पढ़ाई और परीक्षा को लेकर अनिश्चितता में हैं।
- एडमिट कार्ड की समस्या: छात्राओं ने यह भी आरोप लगाया कि सेमेस्टर टू की परीक्षा 15 तारीख से शुरू होनी है, लेकिन कॉलेज प्रशासन ने कई छात्राओं के एडमिट कार्ड वापस ले लिए। कारण बताया गया कि वे इंटरनल परीक्षा में उपस्थित नहीं थीं, जबकि छात्राओं का दावा है कि वे परीक्षा में थीं। बिना एडमिट कार्ड के परीक्षा कैसे देंगी, यह सवाल उन्हें और भी विचलित कर रहा है।
शिक्षकों द्वारा ‘आपत्तिजनक भाषा’ का इस्तेमाल
प्रदर्शन कर रही छात्राओं ने एक चौंकाने वाला और गंभीर आरोप लगाया है। उनका कहना है कि कुछ शिक्षकों ने उन्हें राजनीतिक गतिविधियों में उलझाने की कोशिश की, और जब उन्होंने इसका विरोध किया तो उनसे कहा गया कि “अगर इतना ही शौक है राजनीतिक दल में जाने का, तो तुम्हें मोदी जी का गार्ड बना देंगे।” छात्राओं का सवाल है कि एक शिक्षण संस्थान में ऐसी अभद्र भाषा का इस्तेमाल कैसे किया जा सकता है।
प्रिंसिपल का प्रतिक्रिया: “लिखित शिकायत नहीं मिली”
जब इस गंभीर मामले पर कॉलेज की प्रिंसिपल से बात की गई, तो उनका जवाब आश्चर्यजनक था। उन्होंने कहा कि छात्राओं ने आज तक उनके पास कोई लिखित शिकायत नहीं दी है।
उनके अनुसार, कॉलेज में बाथरूम बने हैं, पानी की व्यवस्था के लिए प्रयास चल रहा है, और खेल तथा सांस्कृतिक कार्यक्रम भी आयोजित होते हैं। उन्होंने सिर्फ इतना आश्वासन दिया कि मूलभूत आवश्यकताओं को जल्द ही पूरा किया जाएगा।
आंदोलन को एबीवीपी का समर्थन
छात्राओं के इस आंदोलन को अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) के छात्र नेताओं का समर्थन भी मिला है। एबीवीपी के नेताओं ने कॉलेज प्रशासन की मनमानी को ‘बर्दाश्त न करने’ की बात कही। उन्होंने चेतावनी दी कि अगर जल्द ही बुनियादी सुविधाओं में सुधार नहीं किया गया, तो यह आंदोलन और भी उग्र रूप ले सकता है।
चार महीने से लटका ज्ञापन, प्रशासन की अनदेखी
छात्राओं ने खुलासा किया कि उन्होंने अप्रैल महीने में ही कॉलेज प्रशासन को अपनी 10-11 मांगों का एक विस्तृत ज्ञापन सौंपा था। चार महीने से अधिक समय बीत जाने के बाद भी एक भी मांग पूरी नहीं हुई है।
अब छात्राओं ने साफ चेतावनी दे दी है: जब तक उन्हें पानी, शौचालय, सैनेटरी मशीन, खेल सामग्री और निष्पक्ष परीक्षा की गारंटी नहीं मिलेगी, वे कॉलेज का ताला नहीं खुलने देंगी। उनका मानना है कि यह लड़ाई केवल उनकी नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों की शिक्षा के लिए है।
शिक्षा व्यवस्था पर बड़ा सवाल
भागलपुर के इतने बड़े महिला कॉलेज में अगर छात्राओं को अपनी बुनियादी ज़रूरतों के लिए सड़क पर उतरना पड़ रहा है, तो यह बिहार की शिक्षा व्यवस्था पर एक गंभीर सवाल खड़ा करता है। क्या कॉलेज प्रशासन जानबूझकर समस्याओं को नज़रअंदाज़ कर रहा है? क्या उच्च शिक्षा विभाग को अब हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए?
यह मामला सिर्फ एक कॉलेज का नहीं, बल्कि महिला शिक्षा की गरिमा और बुनियादी सुविधाओं के अधिकार से जुड़ा है। अब गेंद कॉलेज प्रशासन और राज्य सरकार के पाले में है। देखना यह होगा कि वे इस गंभीर संकट को कितनी तेज़ी और ईमानदारी से हल करते हैं।












