मुंगेर, बिहार: बरियारपुर के शांत घोरघट गाँव से उठी एक ऐसी आवाज़ आज हमेशा के लिए शांत हो गई, जिसकी गूँज केवल मुंगेर ही नहीं, बल्कि समूचे बहुजन समाज के दिलों में महसूस की जाती थी। वासुकी पासवान जी का निधन केवल एक व्यक्ति का जाना नहीं है, यह एक युग की समाप्ति है—एक ऐसे समर्पित सामाजिक कार्यकर्ता, संगठनकर्ता और कला संरक्षक का अवसान है, जिनका जीवन ही संघर्ष, समर्पण और सामाजिक न्याय का जीता-जागता प्रमाण था। उनके जाने से घोरघट ने अपना सबसे मज़बूत स्तंभ, पिता और मार्गदर्शक खो दिया है।
सरकारी सेवा में ‘योद्धा’ का संकल्प
यह जानना आश्चर्यजनक और प्रेरणादायक है कि वासुकी बाबू ने अपनी सार्वजनिक सक्रियता को कभी भी अपनी सरकारी सेवा की चारदीवारी तक सीमित नहीं किया। वह भारतीय रेलवे के एक ज़िम्मेदार अधिकारी थे, लेकिन उनका असली ओहदा समाज के बीच था। उन्होंने कभी खुद को केवल एक ‘अफसर’ नहीं समझा; उनकी आत्मा में अन्याय के ख़िलाफ़ जलती मशाल ने उन्हें हमेशा ‘समाज के लिए खड़े रहने वाले योद्धा’ के रूप में परिभाषित किया।
उनका संपूर्ण जीवन दर्शन बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर के विचारों में गहराई से रँगा हुआ था। वह मानते थे कि सरकारी सेवा आजीविका का साधन हो सकती है, लेकिन समाज सेवा जीवन का उद्देश्य है। इसीलिए, अपने व्यस्ततम पेशेवर जीवन के बावजूद, उन्होंने हर पल, हर साँस और हर सोच को सामाजिक न्याय और उत्थान की दिशा में मोड़ दिया। उनका घर, सही मायने में, शोषितों, पीड़ितों और कलाकारों के लिए एक संघर्ष की खुली पाठशाला था।
घोरघट: जहाँ से जगी कला और न्याय की अलख
वासुकी पासवान जी की कर्मभूमि घोरघट गाँव थी, एक ऐसा गाँव जो कभी गुमनाम सा था, लेकिन वासुकी बाबू के अथक प्रयासों से रंगमंच और सामाजिक सक्रियता का केंद्र बन गया।
उन्होंने यहाँ से रंगमंच की एक ऐसी अलख जगाई, जिसने स्थानीय प्रतिभाओं को मंच दिया और उन्हें समाज की पीड़ा को कला के माध्यम से व्यक्त करने का साहस दिया। नाटक, कविता, और साहित्य—हर विधा में उन्होंने समाज की कड़वी सच्चाइयों, जातिगत भेदभाव और असमानता को मंच दिया। उनका मानना था कि कला मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि परिवर्तन का सबसे शक्तिशाली हथियार है। उनके मार्गदर्शन में विकसित हुए कितने ही कलाकार आज बड़े शहरों और मंचों पर अपनी पहचान बना चुके हैं, और वे सभी अपनी सफलता का श्रेय उन्हीं को देते हैं।
सांस्कृतिक विरासत के संरक्षक: ‘लाठी महोत्सव’ का संघर्ष
वासुकी पासवान जी ने स्थानीय संस्कृति को राष्ट्रीय पहचान दिलाने का बीड़ा उठाया था। वह ‘घोरघट लाठी महोत्सव’ को राजकीय दर्जा दिलाने की मांग करने वाली समिति के निदेशक थे। यह महोत्सव केवल एक त्योहार नहीं था; यह शारीरिक कौशल, सांस्कृतिक पहचान और स्थानीय गौरव का प्रतीक था। वासुकी बाबू ने इस कला को पुनर्जीवित करने और उसे उचित सम्मान दिलाने के लिए आजीवन संघर्ष किया। उनका सपना था कि इस अनूठी विरासत को सरकार का संरक्षण मिले, और इस दिशा में उनके प्रयास कभी थमे नहीं।
बहुजन समाज के लिए आशा की आवाज़
सामाजिक संगठन के क्षेत्र में, वासुकी बाबू एक अपरिहार्य नेता थे। वह अखिल भारतीय दुसाध उत्थान परिषद, मुंगेर प्रमंडल के प्रमंडलीय अध्यक्ष थे। इस पद पर रहते हुए उन्होंने अपने समाज के उत्थान, शिक्षा और अधिकारों के लिए ज़ोरदार आवाज़ उठाई। वह जानते थे कि संगठित शक्ति ही सामाजिक न्याय की कुंजी है।
उनके काम का दायरा केवल बड़े आंदोलनों तक सीमित नहीं था; वह ज़मीनी स्तर की समस्याओं को हल करने में सबसे आगे रहते थे:
- बुनियादी सुविधाएँ: उन्होंने घोरघट रेलवे हाल्ट पर यात्री शेड और टिकट खिड़की जैसी अत्यंत आवश्यक सार्वजनिक सुविधाओं के लिए लगातार आवाज़ उठाई।
- सुरक्षा और विकास: गाँव के विद्यालयों को नदी के कटाव से बचाने की उनकी माँग स्थानीय शिक्षा और बुनियादी ढाँचे की सुरक्षा के प्रति उनके गहरे सरोकार को दर्शाती है।
वह हमेशा सबसे पहले खड़े मिलते थे—चाहे किसी गरीब की व्यक्तिगत मदद करनी हो, किसी कलाकार को प्रोत्साहन देना हो, या फिर सामूहिक न्याय के लिए सड़कों पर उतरना हो।
व्यक्तिगत लगाव और अपूरणीय क्षति
आज वासुकी पासवान जी के जाने से जो शून्य उत्पन्न हुआ है, वह किसी भी तरह भरा नहीं जा सकता। जैसा कि उनके एक करीबी ने हृदयविदारक शब्दों में व्यक्त किया, “आज दिल बहुत भारी है… जैसे कोई लौ थी जो अंधेरे में जलती थी, वो अब बुझ गई हो।”
उनका जीवन एक खुला ग्रंथ था, जिसने सबको सिखाया कि संघर्ष करना क्या होता है, समर्पण कैसा होता है, और समाज के लिए जीना कैसे होता है। उनके मार्गदर्शन, स्नेह और निडरता के साये में पले-बढ़े लोग आज खुद को अनाथ महसूस कर रहे हैं। बहुजन समाज रो रहा है, कलाकारों की आँखें नम हैं, और रंगमंच मौन है, क्योंकि उसका सबसे ऊँचा, सबसे मजबूत स्तंभ गिर गया है।
वासुकी पासवान जी का जीवन हमें सिखाता है कि पद या पैसा नहीं, बल्कि नैतिकता और सामाजिक दायित्व ही मनुष्य की असली पहचान है। उन्होंने अपने कृत्यों से यह सिद्ध किया कि एक व्यक्ति, अपने सीमित साधनों के बावजूद, पूरे समाज के लिए आशा का संचार कर सकता है।
उनके जाने से हमारी आँखें नम ज़रूर हैं, लेकिन उनका जीवन हमें जिंदगी भर सिखाएगा भी, और प्रेरित भी करेगा। वासुकी बाबू कहीं नहीं गए हैं; वह उन सभी दिलों में हमेशा ज़िंदा रहेंगे जिन्होंने उनके मार्गदर्शन में निडर होकर खड़े रहना सीखा। यह उनका शाश्वत संदेश है—संघर्ष करते रहो, समर्पण बनाए रखो, और समाज के लिए जीते रहो।
भावभीनी और अश्रुपूरित श्रद्धांजलि।








