बिहार के मुंगेर जिले में बाढ़ प्रभावित परिवारों को मिलने वाली सरकारी सहायता राशि अब राजनीतिक टकराव का बड़ा मुद्दा बन चुकी है। सरकार की ओर से प्रत्येक प्रभावित परिवार को ₹7000 की राहत राशि देने की घोषणा की गई थी, लेकिन वितरण प्रक्रिया में कथित अनियमितताओं और भ्रष्टाचार के आरोपों ने हालात को और जटिल बना दिया है।
गांव-गांव में राहत राशि न मिलने की शिकायतें बढ़ रही हैं। कई परिवारों का कहना है कि उन्हें अब तक कोई सहायता नहीं मिली, जबकि कुछ घरों में दो से तीन लोगों को भुगतान किया गया है। यही असमानता अब सड़क पर आंदोलन और राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप में तब्दील हो चुकी है।
सड़क पर उतरे बाढ़ पीड़ित, धरना और जाम से बिगड़े हालात
बरियारपुर प्रखंड में हाल ही में सैकड़ों बाढ़ पीड़ितों ने नेशनल हाईवे को जाम कर दिया। उनकी मांग साफ थी—जिन परिवारों का नाम राहत सूची से छूट गया है, उन्हें तुरंत मुआवजा दिया जाए। स्थानीय लोगों का आरोप है कि बिचौलियों और अधिकारियों की मिलीभगत से कई पात्र लोग वंचित रह गए हैं।
धरना स्थल पर मौजूद लोगों ने कहा कि जब तक सभी प्रभावित परिवारों को राहत राशि नहीं मिल जाती, आंदोलन जारी रहेगा। ग्रामीणों के इस गुस्से को देखते हुए प्रशासन भी दबाव में है, लेकिन अब तक कोई ठोस समाधान सामने नहीं आया है।
विपक्ष का हमला: “भ्रष्टाचार ने राहत योजना को मज़ाक बना दिया”
इंडिया गठबंधन और राजद के कार्यकर्ताओं ने बाढ़ पीड़ितों के आंदोलन को समर्थन दिया है। पूर्व राजद प्रत्याशी मुकेश यादव ने आरोप लगाया कि राहत वितरण में भारी भ्रष्टाचार हुआ है।
उनके अनुसार, “किसी घर में तीन-तीन लोगों को पैसा मिला, जबकि कई गरीब परिवार आज भी वंचित हैं। बिना पैसे दिए किसी को मुआवजा नहीं मिल रहा। यह स्थिति बेहद शर्मनाक है और हम तब तक आंदोलन करेंगे जब तक सभी पात्र लोगों को राहत राशि नहीं मिल जाती।”
राजद नेताओं ने सरकार पर सवाल उठाते हुए कहा कि प्रशासनिक लापरवाही और भ्रष्टाचार ने बाढ़ पीड़ितों की पीड़ा को और बढ़ा दिया है।
भाजपा विधायक का पलटवार: “राजद कर रहा है मुद्दा विहीन राजनीति”
मुंगेर के भाजपा विधायक ने विपक्ष के आरोपों को राजनीति से प्रेरित बताया। उन्होंने कहा कि “राजद के पास कोई ठोस मुद्दा नहीं है, इसलिए वह मुआवजे के नाम पर जनता को बरगला रहा है।”
हालांकि, विधायक ने यह भी स्वीकार किया कि अंचल कार्यालय में गड़बड़ी हुई है और बिचौलियों की भूमिका संदिग्ध है। उन्होंने डीएम से मांग की है कि दोषी अधिकारियों और कर्मचारियों पर सख्त कार्रवाई हो।
विधायक का दावा है कि अब तक 35,000 प्रभावित परिवारों में से लगभग 30,600 परिवारों को राशि दी जा चुकी है और केवल 4400 लोग ही शेष हैं, जिनका नाम जोड़ा जा रहा है।
प्रशासन का दावा और जनता का सवाल
प्रशासन की ओर से कहा गया है कि राहत राशि का वितरण लगातार चल रहा है और जिनका नाम छूट गया है, उन्हें भी सूची में जोड़ा जाएगा। लेकिन सवाल यह उठता है कि अगर सरकारी तंत्र ईमानदारी से काम कर रहा है, तो फिर सड़कों पर बार-बार आंदोलन क्यों हो रहे हैं?
ग्रामीणों का आरोप है कि जब तक अधिकारी “मांगने पर” नाम नहीं जोड़ते, तब तक आम लोगों की समस्या बनी रहती है। ऐसे में यह पूरी प्रक्रिया पारदर्शिता पर सवाल खड़े करती है।
चुनाव से पहले बड़ा मुद्दा बनता मुआवजा विवाद
बिहार विधानसभा चुनाव में अब ज्यादा समय नहीं बचा है। ऐसे में बाढ़ मुआवजा विवाद विपक्ष के लिए एक बड़ा मुद्दा बन गया है। राजद और इंडिया गठबंधन लगातार जनता के बीच जाकर सरकार की कार्यप्रणाली पर सवाल उठा रहे हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि बाढ़ राहत की यह गड़बड़ी केवल एक प्रशासनिक समस्या नहीं है, बल्कि इसका सीधा असर चुनावी राजनीति पर पड़ सकता है।
क्या सरकार इस मुद्दे को शांत कर पाएगी, या फिर यह चुनावी रणभूमि में विपक्ष के लिए हथियार बन जाएगा? यह आने वाला समय बताएगा।
जनता की पीड़ा: “राशन तक नहीं मिला, सिर्फ आश्वासन”
कई ग्रामीणों का कहना है कि बाढ़ राहत सिर्फ कागजों पर दिखाई दे रही है। गांवों में न तो चूड़ा, चीनी, पन्नी और न ही अन्य सामग्री सही तरीके से बांटी गई। कई पंचायतों में लोग अब भी सहायता का इंतजार कर रहे हैं।
एक महिला ने आक्रोश जताते हुए कहा, “सरकार कह रही है कि हमें ₹7000 मिले हैं, लेकिन असलियत यह है कि हमारे खाते में कुछ नहीं आया। गरीबों को सिर्फ आश्वासन मिलता है, मदद नहीं।”
सवाल खड़े कर रहा है भ्रष्टाचार का खेल
जांच में सामने आया है कि कई जगह बिचौलियों की मिलीभगत से फर्जी नाम सूची में जोड़े गए। वहीं असली पीड़ित आज भी लाइन में खड़े हैं। यह स्थिति न सिर्फ प्रशासन की कमजोरी को उजागर करती है, बल्कि यह भी बताती है कि आपदा राहत योजनाएँ कितनी संवेदनशील और पारदर्शी होनी चाहिए।
निष्कर्ष: राहत या राजनीति?
मुंगेर का यह बाढ़ मुआवजा विवाद केवल राहत वितरण का मामला नहीं रह गया है। यह अब पूरी तरह से राजनीतिक रंग ले चुका है।
जहाँ एक ओर पीड़ित परिवार अपनी बुनियादी ज़रूरतों और अधिकारों के लिए सड़क पर उतरने को मजबूर हैं, वहीं दूसरी ओर नेता इसे चुनावी हथियार की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं।
सवाल यह है कि आखिरकार जनता को राहत कब और कैसे मिलेगी? क्या यह विवाद चुनाव तक ही चलता रहेगा, या फिर सरकार और प्रशासन पारदर्शिता के साथ इस समस्या का समाधान करेंगे?
मुंगेर की जनता का धैर्य अब जवाब देने लगा है। यदि जल्द ही ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो यह मुद्दा राज्य की राजनीति में बड़ा तूफान खड़ा कर सकता है।








