भोजपुरी संगीत को लेकर हमारी राय अकसर बँटी हुई रही है। एक तरफ़ इसकी ठेठ मिट्टी वाली मिठास है, तो दूसरी तरफ़ हाल के सालों में छा गई अश्लीलता और व्यावसायिकता का बोझ। ऐसे में, जब मैंने पहली बार कल्पना पटवारी का गाना “गंगा स्नान” सुना, तो मानो दिल को सुकून मिला। यह सिर्फ़ गाना नहीं है—यह भोजपुरी की खोई हुई आत्मा को वापस लाने की एक ज़बरदस्त कोशिश है, और इसने सच में क्रांति ला दी है।
कल्पना की आवाज़ और भिखारी ठाकुर की विरासत
कल्पना पटवारी की आवाज़ में एक अजीब-सी जादुई पकड़ है। यह इतनी ताकतवर और शहद-सी मीठी है कि आप बस डूब जाते हैं। “गंगा स्नान” सुनकर यह बात पक्की हो जाती है कि शुद्धता और संस्कृति को गाने में उतारने के लिए किसी सस्ते हथकंडे की ज़रूरत नहीं है। यह गीत मनोरंजन से कहीं आगे निकलकर एक गहरा, भावनात्मक संदेश देता है।
सबसे बड़ी बात यह है कि इस गाने में भिखारी ठाकुर जैसे महान साहित्यकार की विरासत को सम्मान दिया गया है। गाने का विषय—पवित्र गंगा नदी की महिमा—कितना सभ्य और शाश्वत है! गंगा को यहाँ बस नदी नहीं, बल्कि एक माँ की तरह दिखाया गया है, जो हमारे हर दुख, हर पाप को चुपचाप अपने आँचल में समेट लेती है और हमें शांति देती है। यह केवल धार्मिक नहीं, बल्कि एक गहरा मानवतावादी नज़रिया है।
संगीत का अनोखा संगम और एक नई राह
गाने का संगीत सुनकर मज़ा आ जाता है। इसमें लुइज़ बैंक्स, दिलशाद खान और जोई बरुआ जैसे दिग्गजों ने कमाल किया है। यह सिर्फ़ परंपरागत नहीं है; यह आधुनिक धुनों के साथ एक ऐसा खूबसूरत तालमेल बिठाता है कि इसे सुनने वाला हर कोई, चाहे वह गाँव का हो या शहर का, इससे जुड़ जाता है। भारतीय और पश्चिमी संगीत का यह बेहतरीन मेल इसे एक वैश्विक पहचान देता है।
साफ़ कहूँ, यह गाना उन सभी कलाकारों और निर्माताओं के लिए सीधा संदेश है जो मानते हैं कि बिना अश्लीलता के भोजपुरी गाना चल नहीं सकता। “गंगा स्नान” ने यह भ्रम तोड़ दिया है। दर्शकों की सकारात्मक प्रतिक्रिया इसका सबसे बड़ा सबूत है—उन्होंने इस गीत को भोजपुरी संस्कृति को बचाने वाला मील का पत्थर कहा है।
यह गीत भोजपुरी संगीत के भविष्य के लिए एक उम्मीद है। अगर हमें अपनी सांस्कृतिक जड़ों को थामकर आगे बढ़ना है, तो हमें ऐसे ही ईमानदार और शुद्ध संगीत की ज़रूरत है। कल्पना पटवारी और उनकी टीम ने जो कर दिखाया है, वह सचमुच अमूल्य है।
जय भोजपुरी!












